|
मुझे बरेली छोड़े बरसों हो गये। बरेली में जब रहा भी तो न रहने के बराबर। कितना घूमना हुआ। अब ३८-३९ साल तो भारत से बाहर ही हो गये। अब कोई पूछता है कि आप कहाँ के हैं तो क्या जबाब दिया जाये? अब ८-१० साल बरेली में रहा और कुल मिला कर २६-२७ साल ही भारत में रहा। जब भारत से ज़्यादा भारत के बाहर रहा हूँ तो इस हिसाब से मुझे अपने आपको कनाडा निवासी ही कहना और समझना चाहिये। पर होता नहीं है। बरेली वाला ही कहता हूँ। क्यों कहता हूँ इसका कोई जबाब नहीं है।
प्रशन् है कि हम हैं कहाँ के? कौन सी जगह अपनी है? जिस घर में जन्म लिया उससे अब न कोई रिशता नाता है और न ही लगता है। यह भी नहीं पता कि उस घर में रहता कौन है। तीन साल पहले रवी और मैं उस रामपुर वाले घर के सामने जा कर खड़े भी रहे पर यह लगा नहीं कि इससे हमारा कोई रिशता है। बरेली के मदारी दरवाज़े वाले घर में मैंने बचपन के ५-६ साल मामा जी और माईं जी के साथ गुज़ारे और बहुत अच्छे गुज़ारे। वह घर मेरे यादों का हिस्सा है। मेरे बहुत से सपने उसी मकान के जुड़े रहते हैं। बाद को मेरा पूरा परिवार वहाँ कई साल रहा। अब वहाँ कोई और रहता है। हमारा ही बचपन का दोस्त है। मेरा वहाँ आना जाना भी रहता है। पर वह घर अब अपना नहीं लगता है। कभी मैं अपने भाई बहनों से भी पूछूँगा कि उन्हें उस घर से अपनी धड़कनें जुड़ी हई लगती हैं या नहीं?
क्या बदल जाता है कि अपने घर भी अपने नहीं लगते बस मकान ही रह जाते हैं। तो फिर मकान घर में कैसे बदला जाता है। वैसे तो यह कहावत भी है कि बिन घरनी घर भूत का डेरा। माँ बाप जहाँ रहते वह घर तो अपना लगता ही नहीं होता भी है। वहाँ हम बिना पूछे ताछे एक अधिकार के साथ आते जाते हैं। घर छोटा हो बड़ा हो पर हम रहते हैं तो प्यारा लगता है। वहाँ हमारे लोग रहते हैं तो प्यारा लगता है। यह भी नहीं है कि हर वह घर जहाँ रिशते नाते के लोग रहते हैं वह अपना घर ही लगे। तो यह एक अजीब सी विडम्बना है कि किस घर को अपना घर कहा जाये? हमारे सगे भाई बहन भी जिस घर में रहते हैं वह भी अपना ही लगे कुछ अवशयक नहीं है।
यहाँ कनाडा ही में पहले एक एपार्टमेन्ट में रहता था और १२ साल रहा। बड़ी ही सुन्दर और प्यारी जगह थी। उसे छोड़ने का ना तो कोई इरादा था और न ही मन था। सोचते थे कि बाकी समय उसी में रहेंगे। पर एक दिन आबोदाना उठ ही गया और हमने अपना निजी मकान ख़रीद लिया। वह एपार्टमेन्ट बस कोई पाँच मिनट की ही दूरी पर है। पहले जो कदम स्वयं ही उस रास्ते को मुड़ जाते थे अब उसे बिलकुल ही भुला चुके हैं। पहले तो कार भी अपने आप ही वहाँ जा कर खड़ी हो जाती थी पर अब उसे भी वह रास्ता याद नहीं है। क्या बदला? शायद जेब ख़ाली हुई तो अपने घर से मोह हो गया। अब आज यही सोचते हैं कि बस अब यही घर है जहाँ अन्त समय तक रहना है।
वैसे सम्भावना तो यही है कि एक न एक दिन इस इतने बड़े घर से निकलना ही पड़ेगा। कारण अनेक हो सकते हैं। बाद को यह घर जिसमें २० से भी ज़्यादा वर्ष हो गये हैं अपना तो नहीं ही लगेगा। शायद पैरों को यह सड़क भी याद नहीं रहेगी। तो क्या बदल जायेगा? अपना घर है कहाँ?
यहीं हमारी सास रहती थीं और हम उनके घर आते जाते ही रहते थे। उस समय उनकी कलैनरैनल्ड स्ट्रीट अपने जीवन का बड़ा हिस्सा लगती थी। आज उनके मरने के बाद वहाँ कभी गये ही नहीं। लोग जाते हैं तो उनके साथ मन में बने नक्शे भी बदल जाते हैं। काग़ज़ पर बने नक्शों और मन पर खिंचे नक्शें में बहुत दूरी हो जाती है। इलेन के चाचा मेरे बड़े दोस्त थे। १०३ साल की उमर में ऊपर गये। वह ६० साल एक ही मकान में रहे और वहीं से एक सुबह चले गये। बड़ी अच्छी तरह की मौत हुई उनकी। मेरा उनका ३६ साल का साथ रहा। उनका घर और उनके घर वाली रिजवुड एवेन्यू भी अपनी ही लगती थी। ५ साल से तो अब उस सड़क का नाम ही याद नहीं आया। मैं तो भूल ही गया था। अब जब लिखने लगा तो फिर से ज़ोर लगा कर याद करना पड़ा। कुछ तो उम्र की भी बात हो जाती है। चीज़ें कभी समय पर याद ही नहीं आती हैं।
मैं १० साल हमिंगबर्ड कम्पनी में रहा। इधर उधर और चारों तरफ घूमने के अलावा हफ्ते में २ दिन नियम से टोरांटो हेड आफिस में रहता था। वहाँ घर तो था नहीं एक होटल में रहता था। कुल मिला कर १००० दिन तो उस होटल में गुज़ारे ही होंगे। जहाँ तक हुआ मैं ६०१ नम्बर के कमरे में रहता था और आज भी जाता हूँ तो मुझे वही कमरा मिल जाता है। एक दिन किसी ने पूछा कि आप अपने घर को मिस नहीं करते हैं तो मैंने कहा मै इसे भी घर ही समझता हूँ। यहाँ काम करने वाले भी सब परिवार की तरह हैं। आज भी पुराने लोग मुझे पकड़ लेते हैं कि मैं जनरल मैनेजर से कह कर उनका काम करा दूँ या पालिसी में कुछ बदल करा दूँ। मैं करा तो क्या ही सकता हूँ फिर भी उन्हें लगता है कि मैं उसी परिवार का हिस्सा हूँ। तो होटल का कमरा भी घर की ही तरह लगता है। या ईलाही यह माज़रा क्या है? कोई जगह अपनी लगती है या नहीं इसकी कोई कैमिस्ट्री है या कोई और कारण है? क्या हम अपनी अक्ल और मरज़ी से ही काम कर पाते या कहीं और से डोरियाँ खिंच रही हैं? अब मैं अपने माँट्रियाल के घर की ही बात ले लूँ तो यह भी बड़ी अजीब बात हुई। मेरा या इलेन का घर ख़रीदने का कोई इरादा था ही नहीं। मगर कभी कभी अगर कोई घर बिकता दिखा तो उसे देखने भी चले जाते थे। यों ही बेमन से गये, उचटती हुई निगाह से देखा और यह अच्छा नहीं है वह ठीक नहीं है कहते हुए वापस आ जाते थे। एक दिन यों ही कहीं और जाते हुए इस घर के सामने से निकले और देखा कि दरवाज़ा खुला है और कई लोग इसे देख रहे हैं। हम भी खड़े हो गये। दरवाज़े के अन्दर जाने के पहले ही इलेन ने कह दिया कि अगर हम कोई घर लेते हैं तो बस यही होगा। और हमने २ मिनट में यह घर ख़रीद लिया। घर ने ही हमें चुन कर पकड़ लिया। घर तो हमारी अवशयकता से कहीं ज़्यादा बड़ा था। मगर देखिये कि इस घर में आने के बाद एक महीना भी नहीं हुआ था कि दिल्ली से राजू का फोन आया कि वह अपनी पढ़ाई करने कनाडा आना चाहता है। वह आ गया और इस घर में रह कर पाँच साल पढ़ा। उसके बाद ईरान का रिफ़यूजी मजीद जाने कैसे रहने आ गया। ईलेन चीन गईं तो वहाँ से स्टूडेन्ट आने लगे। वह सब भी कुछ दिन इसी घर में रहते थे। उन दिनों यह घर एक होस्टल जैसा लगता था। उन सबकी तकदीर में यह घर था। मैं और ईलेन तो एक बहाना बन गये। अगर होप स्ट्रीट वाले पुराने घर में ही रहते तो यह लोग कोई वहाँ नहीं रह सकते थे।
ज़मीन की, घर की, जगह की कोई अपनी आवाज़ होती है या यह इनके साथ हम जो चाहे कर सकते हैं? हम मकान ज़मीन आदि चुनते है या वह हमें?
अमरीका के पहले निवासी जिन्हे लोग ग़लती से इंडियन या रेड इंडियन कहते है इस बात में विशवास रखते हैं कि हर जगह की अपनी शक्ति होती है जिसका हम सब के तन और मन पर प्रभाव पड़ता है। यह कभी अच्छा होता है और कभी बुरा भी होता है। बात यह भी है कि इस शक्ति का हमें आभास भी होता है। इनके आदर के स्थान के भी प्राक्रतिक हैं और बहुत सुन्दर हैं। भारत में भी हमारे तीर्थ स्थान सागर के या नदियों किनारे या पहाड़ों पर हैं। इन बहुत से स्थानों में लोग मन की शान्ति के लिये जाते हैं। यहाँ देखने की चीज़ें कोई खास प्रभावशाली नहीं हैं। हमारी बड़ी आस्था वाले मन्दिर तो बहुत ही छोटे हैं और साधारण हैं। पर लोग इस विशवास से जाते हैं कि वहाँ कोई बड़ी शक्ति निवास करती है और उसका हमारे ऊपर प्रभाव होगा।
मैं जब फिलिप्स कम्पनी में काम करता था तो हमारा काम बहुत तेज़ी से बढ़ रहा था। नये लोग बड़ी तेज़ी से भरती हो रहे थे और जगह हमेशा कम रहती थी। आख़िर में मुझे नया आफिस बनाने की छूट मिल गयी और हम सब बडे़ उत्साह से इस काम में लगे। मेरी यह इच्छा थी कि इस नये दफ्तर से सभी ख़ुश हों और सभी का उत्साह बढ़े। एक आर्किटेक्ट नियुक्त हुआ और उसने एक प्लान बना कर मुझे दिया। उसे मंज़ूर करने से पहले मैं अपने कुछ लोगों के साथ वह फ़लोर देखने गया। यहाँ कुछ था नहीं बस खाली जगह थी। कुछ बात हुई कि लोग कहाँ बैठेंगे और ग्रुपिंग कैसे होगी। हम तो यह बात कर रहे थे और मेरा एक साथी जगह जगह घूम कर और खड़ा हो कर कुछ सोच रहा था। उसका यह व्यवहार हम सबको बहुत अजीब लगा। मैंने उससे पूछा कि सब ठीक ठाक तो है। उसने कहा कि यह जगह ठीक नहीं है और यहाँ आफिस बनाने से किसी का भला नहीं होगा। यह साथी एक बहुत काबिल और सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर था और दक्षिण अमेरिका की एक इंडियन ट्राइब से था और यह भी कहता था कि वह एक चीफ़ के परिवार से है और एक शामन भी है। एक भारतीय होने के नाते मुझे या बात इतनी अचकची नहीं लगी पर और दूसरे लोगों को और ख़ास तौर पर हमारे हौलैंड के मैनेजमैन्ट को यह समाझाना कि मै यह जगह इसलिये नहीं लूँगा कि होज़े के अनुसार यह जगह सबके लिये हानिकारक होगी आसान काम नहीं हो सकता था। योरप वाले इस अन्धविशासी बात को मान लेंगे यह बात कोई पागल ही मान सकता था। मैंने होज़े को कहा कि इस बात का करना भी बड़ी बेवकूफी़ की बात समझी जायेगी। मगर होज़े अपनी बात पर डटा ही रहा। बस वह इस बात पर तैयार हुआ कि मेरे और अपने बैठने की जगह वह ख़ुद तय करेगा। उस डिज़ाइन में एक डायेरेक्टर होने के नाते मेरे लिये एक कोने में बहुत बड़े आफिस का प्राविधान था। यह बहुत बड़ा था और उसमें ६ खिड़कियाँ थीं। अमरीका में ही क्या, कहीं भी ऐसा आफि़स मिलना एक बहुत बड़ा आदर माना जाता है। अब होज़े का यह कहना था मैं इस आफिस में बिल्कुल न बैठूँ और इससे अच्छा यह होगा कि कोई दूसरी नौकरी ढूँढ लूँ। पूरा विशवास न होने पर भी मैने उस आफ़िस में न बैठने का मन बनाया। मेरे बैठने की जो जगह निकली वह उस जगह निकली जहाँ बन्द आफ़िस बनना मुशकिल था। तो फिर वह आफ़िस बन गया। मेरे जूनियर बन्द दफ़तरों मेौ बैठे और मेरी मेज़ आफ़िस के बीचों बीच खुले मैदान में पड़ गई। मैंने लोगों यह समझाया कि हमारे पास बन्द दफ्तर कम हैं और मैं एक ओपेन मैनेजमेन्ट को अपनाना चाहता हूँ। बन्द कमरों में बैठ कर गुपचुप मीटिंग करना मेरे स्वभाव में नहीं है और मेरा सब काम एक खुला खेल है। वैसे आपने यह देखा होगा सारे जादूगर भी यही बात कहते हैं कि उनका करिशमा भी खुला खेल कलकत्ते वाला है। ज्यादातर लोगों ने समझा कि विजय माथुर थोड़े से पागल हैं कुछ ने समझा इसमें कोई चाल है। हमारे बास को भी ताज्जुब हुआ और यह ख़बर हौलैंड तक भी गई के कोई पागल माथुर साहब मौंट्रियल आफ़िस में हैं जिन्होंने एक सुन्दर आफ़िस छोड़ कर खुले मैदान में बैठने का फ़ैसला किया है। लोग हौलैंड से आते थे तो मुझे पागल को देखने अवशय आते थे। जैसे लोग ज़ू में बन्दर देखने जाते हैं।
बात आई गई हो गई। हम लोग आपने दिन दुने रात चौगुने बढ़ते काम के बोझ में दबते चले गये। मैं सुबह सात बजे से रात के नौ दस बजे तक लगे रहने के बाद भी काम पर काबू नहीं पाता था। स्टाफ़ का भी यही हाल था। हमारे यहाँ मीटिंगें भी बहुत होती थीं और उसमें भी बहुत समय भी बरबाद होता था और फिर बाकी के काम तो थे ही। दो साल के बाद मैंने हार मान ली और कम्पनी से इस्तीफ़ा दे दिया। बाद को कुछ कम्पटीशन की बात हुई और कुछ टैकन्लाजी बदल गयी और कम्पनी के लोग बदले गये। बदले क्या गये निकाल ही दिये गये। अगला डायरेक्टर जा कर उस आफ़िस में बैठ गया जो मैंने छोड़ दिया था। वह वहाँ तीन महीने रहा और १२ महीने में उस आफ़िस में ६ डायरेक्टर बैठे। मैं तो बड़ी इज़्जत से निकल आया पर उसके बाद लोग बड़ी बेइज़्जती से ही निकाले गये। प्रेसीडेन्ट तथा चेयरमैन तक निकाले गये। बाद फ़िलिप्स ने वह डिवीज़न ही बन्द कर दिया। उसमें इस आफ़िस की जगह का कोई हाथ था या नहीं, या कितना था यह किसको पता है।
यह डोरियाँ कौन खींचता है? मैं तो जानता नहीं हूँ। अब पाठक अगर आपको कुछ ख़बर हो तो मुझे भी बताईएगा। |