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मुझे कोई भी साज़ या बाजा बजाना नहीं आता। बचपन में गा लेता था पर कुछ ख़ास नहीं। बाथ रुम सिगंर से कुछ अच्छा ही था और कई बार स्टेज पर चढ़ने का अवसर भी आया। आज के दिन मुँह से चाहे ठीक गाना न निकले पर दिमाग़ में टयून एकदम दुरुस्त रहती है। एक ही बार सुन कर गाना समझ में आ जाता है। हज़ार से ऊपर गानों की धुनें तो याद होंगी ही।
हमारे परिवार में संगीत का शौक सदा से ही रहा है। पूरी माथुर बिरादरी में गाने बजाने का चलन था। बिना संगीत के लड़कियों की शिक्षा पूरी नहीं मानी जाती थी। जब लड़की देखने वाले आते थे तो पहला सवाल यही होता था कि गाना आता है या नहीं। और बातें भी देखी जाती थी जैसे खाना बनाना, कढाई, सिलाई, शक्ल सूरत इत्यादि इत्यादि। अक्सर दूसरों का बनाया खाना और कढ़ाई का काम लड़की के नाम से चला दिया जाता था। चेहरा भी मेकअप और सर के पल्लू से छुपाया जा सकता था पर गाने में प्लेबैक तो चल नहीं सकता था। हर लड़की को ज़ोर ज़बरदस्ती से दो चार भजन सिखा ही दिये जाते थे और वह जैसे तैसे गा कर अपनी इज़्ज़त बचा लेती थी।
हमारे घर का मामला ज़रा अलग था। मेरे बाबा जी सुना है संगीत के प्रेमी और तबला बजाने में माहिर थे। हमारे रामपुर वाले घर में रोज़ ही शाम को महफ़िले जमतीं थी। रामपुर भारत भर में अपने संगीतज्ञों के लिए मशहूर था। रामपुर के बच्चा कव्वाल मशहूर थे। रामपुर का सैनी घराना एक मशहूर घराना है। रामपुर नबाब के भाई बहादुर हुसैन ख़ुद एक बड़े उस्ताद थे। हैदर अली खाँ, अलाउद्दीन खाँ, मुशताक हुसैन, भातखण्डे, अहमद जान थिरकवा, निसार हुसैन और राशिद खाँ कुछ मशहूर नाम हैं। हिन्दुस्तान के सभी बड़े बड़े संगीतज्ञ रामपुर दरबार में आते थे और बुलाये जाते थे। रामपुर माथुरों का एक बड़ा गढ़ था। रामपुर के मीर मुन्शी हमेशा इसी ख़ानदान के होते थे। गाना बजाना माथुर घरों में ख़ूब होता था। इस ख़ानदान की कोई ही बहु या बेटी होगी जिसे गाना बजाना न आता हो। घरों में संगीत सभाऐं आऐ दिन की बात थीं। शायद ही किसी घर में छोटा बड़ा कोई काम होता हो जिसमें बाजा तबला या ढोलक न निकल आती हो। मेरे बाबा जी की मृत्यु तभी हो गई जब मेरे बाबू जी और ताऊ जी बहुत छोटे थे। ताऊ जी रामपुर से बाहर पढ़ने चले गये और संगीत से उनका कोई ज़्यादा लगाव नहीं रहा। वह पढ़ाई लिखाई में निपुण हुऐ और बहुत नाम किया। मेरे पिता जी रामपुर में रह कर ही पढ़े। वह बहुत अच्छा गाते थे और अन्त समय तक गुनगुनाते रहे।
मेरे नाना जी भी संगीत प्रेमी थे और गाने बजाने के शौकीन थे। ख़ुद भी निपुण थे और बरेली वाले मकान में संगीत की महफ़िलें होतीं थीं। मेरी ख़बर है कि वह सरोद बजाते थे। उनके तबला बजाने वाले पोस्टमैन लल्लू चाचा को मैने भी देखा है। मेरी बऊआ भी बड़ा अच्छा गातीं थीं। मेरी बहनों की भी बचपन से ही संगीत की शिक्षा हुई। सहसवान घराने के चाँद खाँ साहब ने मेरी दोनों बहनों को गाना सिखाया। चाँद खाँ साहब का हमारे घर आना एक बड़ी महफ़िल का हो जाना होता था। बहनों ने जो सीखा वह सीखा पर हम लोगों ने बड़ा अच्छा गाना सुना। फिर बरेली में हमारी बहनों ने सालों साल तबला सीखा और तबले में एम ए लेवल की परीक्षाऐं पास कीं। मैंने सीखा तो कम पर सुना बहुत है।
मेरे कालेज के दोस्त भी गाने बजाने वाले थे। बरेली के तलत महमूद कहलाने वाले वीरेन्द्र सक्सेना मेरे बड़े दोस्त थे। पंडित जगदीश मोहन उस समय बरेली में थे और उनका हम सब पर बड़ा प्रभाव था। शशी कान्त, जयंत गाँगुली, जगदीश पाल भी हमारे गुट के थे। मैं दर्शक ही ज्यादा रहा पर मेरे घर पर यह सब लोग ख़ूब जमा होते थे। हमारी बऊआ को भी यह सब बहुत अच्छा लगता था। हमारे दोस्त भी अपनी ख़ातिर से ख़ुश हो जाते थे।
जयंत से मुझे बंगाली संगीत का परिचय हुआ। बंगाली न जानने पर भी मैं काफ़ी बंगाली गाने गा लेता था। आगे चल कर इसका मुझे बहुत लाभ हुआ। मैं जब अपनी नौकरी के चक्कर में बंगाल और आसाम में रहा तो इस संगीत की राह से मेरे बड़े सम्बन्ध बने और मेरे काम भी बड़ी आसानी से हुऐ। एक बार शिलौंग में मुझे ट्रकों की ज़रुरत हुई जो सरकारी कम्पनी के थे और बहुत मुशकिल से मिलते थे और वह भी काफ़ी पेट पूजा के बाद। पर मेरे संगीत प्रेमी मित्र यह काम चुटकी बजाते करा देते थे। नैपाल में मेरी उस समय के मशहूर गायक बच्चू कैलाश से बड़ी मित्रता थी। इन्हें नैपाल का मुकेश कहा जाता था। जब मैं काठमाँडू में रहता तो यह अपना हारमोनियम उठा कर मेरे होटल के कमरे में आ जाते और फिर वहीं जमे रहते थे। यह राजा महेन्द्र के प्रिय थे और इस वजह से किसी को आसानी से हाथ नहीं रखने देते थे। राजा महेन्द्र बहुत अच्छे कवि थे और बच्चू कैलाश उनके बहुत गाने गाते थे। यह बात भी उड़ी कि बच्चू तीन ही जगह गाते हैं। या तो राजमहल में या रेडियो स्टेशन पर या फिर विजय माथुर के कमरे में। इसमें सच तो कम ही था पर इससे मेरी धाक ख़ूब जमी और नैपाल में काम करना बहुत आसान हुआ। यह मेरी इस बात से प्रभावित हुऐ कि मैं उनका गाना एक बार सुन कर ही उसे सही गा सकता था।
जैसे जैसे मैं काम में ऊपर चढ़ता गया गला मुझे छोड़ कर बहुत दूर चला गया पर धुनें दिमाग़ में सदा चक्कर काटती रहती हैं। यह मुझे बोर होने से बचाता है क्योंकि मेरे मन में हमेशा कोई गाना चलता रहता है और मैं अपने आस पास की बातों पर ध्यान नहीं देता और अपने में ही मस्त रहता हूँ। मैंने नैपाल के पहाड़ों और जंगलों में बहुत काम किया। मधुमती फ़िल्म के दिलीप कुमार की तरह मैं भी गाता गुनगुनाता पहाड़ों में मीलों बिना थके हुए चला जाता था। यहाँ कोई सुनने वाला नहीं होता था और जंगल पहाड़ मेरे सुरे बेसुरे गाना का बुरा भी नहीं मानते थे। मेरे साथ काम करने वाले भी इस पर कोई कमेन्ट नहीं करते थे और इसे मेरा बचपना समझ कर माफ़ कर देते थे। मैं भी अपने को दिलीप कुमार जैसा ही समझता था।
अब गाना सुनना कुछ बहुत मुशकिल काम नहीं है। घर में, गाड़ी में या सड़क पर कहीं भी चाहे सुनें। आईपोड ने तो यह काम बहुत ही आसान कर दिया है। एक छोटी सी दो इँच की यूनिट में हज़ार से भी ऊपर गाने भरे जाते हैं। इन्टरनैट ने तो यह काम और भी आसान कर दिया है। कुछ ख़रीदने की भी अवशयकता नहीं है। मैं जिसका जो भी गाना सुनना चाहूँ सहज ही सुलभ है। मेरे रिकार्ड प्लेयर, सीडी प्लेयर और कैसट प्लेयर बेकार पड़े रहते हैं और मैं अपने लैपटाप पर ही गाने सुनता हूँ। गाने भी चलते रहते हैं और दूसरे काम भी साथ साथ चलते हैं। विन्डोज़ का यही फ़ायदा है।
माँट्रियाल में आकर एक काम और मेरे हिस्से में आया। वह था बड़े प्बलिक म्यूज़िक प्रोग्राम कराने का। मुझे इस काम का कोई पता नहीं था। भारत में मैंने बस एक ही प्रोग्राम कराया था। बरेली की कैम्फ़र फैक्टरी में मुकेश साहब का एक बड़ा प्रोग्राम करवाया गया था। यह तो ख़ैर फैक्टरी का काम था और इसमें बहुत लोगों का हाथ था। मेरा काम बस बम्बई जा कर मुकेश साहब को राज़ी करना था। और इस काम में हमारे डाइरेक्टर दामू भाई की मदद बहुत काम आई। उनकी एक फ़ोन काल पर मुकेश साहब से काम बन गया और उन्होंने बरेली आ कर दस हज़ार लोगों के सामने बड़ा सफ़ल कार्यक्रम किया। मेरा दुर्भाग्य यह रहा कि सब इन्तज़ाम करवा कर भी मैं इसे सुन नहीं पाया। काठमाँडू में कुछ ज़रुरी काम आ गया।
एक दिन एक दोस्त अमरीका के बोस्टन में मशहूर सितार वादक विलायत ख़ाँ साहब का प्रोग्राम सुन कर आये और इस बात से बहुत दुखी हुऐ कि माँट्रियाल में उनका प्रोग्राम क्यों नहीं हो रहा है। मैने तो विलायत साहब का नाम ही सुना था, कभी उनका सितार वादन तो सुना ही नहीं था। रिकार्ड तक नहीं सुना था। माँट्रियाल में हमारा न तो कोई आर्गनाइज़ेशन था और ना ही बड़े प्रोग्राम कराने का कोई तजुरबा ही था। पैसे भी हमारे पास नहीं थे। खैर बेफ़कूफ़ों की तरह मैंने और मेरे तीन और दोस्तों ने मूसल से न डर कर ओखल में सर दे ही दिया। मगर बेवकूफ़ों या अन्धों के हाथ भी कभी कभी बटेर लग ही जाती है। हमारा प्रोग्राम भी गिर पड़ कर हो ही गया। ८०० लोग आये। विलायत हुसैन साहब ने ग़ज़ब का बजाया। उनके लड़के शुजात ने भी पहली बार स्टेज पर यहीं बजाया। हम तो हर तरह से अनाड़ी ही थे पर विलायत साहब ने हर तरह से हमारी इज़्ज़त रखी। बाद में हमें यह महसूस हुआ कि हममें कितनी नादानी थी कि हमने इस तरह के काम में हाथ डाला। पर कभी कभी ऐसा हो जाता है कि जहौँ अक्लमन्द लोग जाते डरते हैं वहौँ अनाड़ी लोग बेधड़क घुस जाते हैं। बस यह समझिये कि कुछ ऐसा ही हमारे साथ हुआ।
अब जब एक बार हम शुरु हो ही गये तो फिर यह फ़ैसला हुआ कि चलो अब चल पड़े तो चल पड़े। अगला प्रोग्राम प्रसिद्ध गायक भीमसेन जोशी का तय हुआ। वह दस लोगों के साथ आये और आठ दिन हमारे साथ रहे। ईलेन भीमसेन जोशी की बड़ी प्रशंसक थीं और उनका इसमें बहुत बड़ा सहयोग रहा। उनका सहयोग तो हर बात में ही रहा है। बिना उनके सहयोग और सहायता के मैं इन कामों में न तो इतना समय लगा सकता था और न ही इतना पैसा गँवा सकता था। इन कामों में नुकसान तो होना ही होना था। पर इसमें आन्नद इतना था कि हमें पैसा गँवाना भी अच्छा लगा। इतने इतने बड़े संगीतज्ञों का साथ रहा और सुन्दर संगीत सुनने का अवसर मिला। भीमसेन जी के बाद निखिल बैनर्जी सितार बजाने आये। बहुत ही बढ़िया आदमी और बहुत ही अच्छे सितारवादक थे। उनके साथ मेरा बड़ा अच्छा समय बीता। वह संगीत और संगीतज्ञों के बारे में बड़े मज़ें के किस्से सुनाते थे। उसके बाद गंगूबाई हंगल और उनकी बेटी कृष्णा हंगल आईं। यह सिलसिला जब चल निकला तो फिर सात साल चला। चौरसिया जी आये, शिवकुमार शर्मा आये, लक्ष्मी शँकर और रवीशंकर जी आये। परवीन सुल्ताना, वी वी जोग, हलीम ज़ाफ़र खाँ, अल्लाह रक्खा, ज़ाकिर हुसैन, अलीअकबर खाँ और बालमुरली आये। चौरसिया, जसराज, भीमसेन जी तो बार बार आये। किशोरी अमोनकर से में बड़ा प्रभावित हुआ। दक्षिण भारत के कम से कम २० संगीतकार आये। बी और सी ग्रेड के तो अनेक आर्टिस्ट आये और इनके नाम गिनाने में काफ़ी पेज भरेंगे। जगजीत सिंह का यहाँ पहला प्रोग्राम भी हम लोगों ने ही कराया। तब इन्हें कोई जानता नहीं था और हम इनके लिये १०-१२ लोग ही जुटा सके। बड़ी निराशा हुई। अब आज जब जगजीत सिंह आते हैं तो हाल छोटे पड़ जाते हैं।
ग़ुलाम अली, मेंहदी हसन, नुसरत अली फ़तेह अली और नूरजहाँ के प्रोग्राम भी सुनने को मिले। मन्ना डे, किशोर कुमार, रफ़ी साहब, आशा जी, लता जी और मुकेश साहब को लाइव सुनने का मौका मिला है। मुकेश साहब का आख़िरी कार्यक्रम यहीं हुआ था। उसके दो दिन बाद ही उनकी मृत्यु हो गई।
यहाँ इतनी दूर बैठ कर इतने बड़े बड़े लोगों को सुना, उनके कार्यक्रम कराये और उनके साथ समय बिताया। प्रोग्राम के बाद सब आर्टिस्ट हमारे ही घर पर खाना खाते थे और यह अवसर मुझे और ईलेन दोनों को बहुत पसन्द थे।
बाहर रहने का इतना फ़ायदा तो हुआ ही। भारत में रहता तो ऐसा कभी नहीं हो सकता था। आर्टिस्टों से व्यक्तिगत संबन्धों के आधार पर भारत में भी कुछ प्रोग्रामों में पहुँच सके, पर कठिन ही रहा। पाठक, मैं इसे बड़ा सोभाग्य समझता हूँ कि सरस्वती देवी का वरद् हस्त मुझ पर है। मैने अब यह सब कराने से तो हाथ ख़ीच लिया है पर अपनी पुरानी कारगुज़ारियों के बल बूते पर जगह जगह बुला लिया जाता हूँ और शौक चलता रहता है।
वैसे मेरी दादी यह कहा करती थीं कि यह शौक या तो रईसों का है या फ़कीरों का और मध्य वर्ग के लोगों को इससे दूर ही रहना चाहिये। यह घर फूँक तमाशा देखने वाली बात है। मैने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया और इसका फल अच्छा निकला है या बुरा यह फ़ैसला भी मैं करने के मूड में नहीं हूँ।
पाठक आप समझ ही गये होंगे कि मेरे दिमाग़ मे सहगल साहब की कोई ग़ज़ल चल रही है। कहें क्या जो पूछे कोई हमसे मीर, जहाँ में तुम आये थे क्या कर चले। मैं यही कहूँगा कि किया धरा जो भी हो पर मज़ा बहुत आया। |