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मैंने यह गुरु शब्द उनके साथ लगा तो दिया पर उन्होने ने उसे कभी पसन्द नहीं किया। वह अगर आज होते तो मुझे कुछ कहते ज़रुर। पर अब जब वह नहीं हैं तो ऐसी मेरी हिम्मत हो ही गई। वह सदा छोटे मोटे गुरुओं और महंतो को होटल मैनेजर कहा करते थे। क्यूँकि इनका सारा व़ख्त अपने मन्दिर आश्रम के इन्तज़ाम में निकलता है। दूसरों को सादगी और त्याग का सन्देश देने वाले दूसरों के त्यागे पैसे से अपने सुख का ख़ूब इन्तज़ाम करते हैं। हरीश भाई ने बड़े बड़े गुरुओं को ढूँढ़ा, उनकी बातें सुनी, उन पर फ़िल्में बनाई और उनकी पोल भी खोली। मगर आख़िर को बाल बेतरतीब बिखराये और सफ़ेद कुरता और पजामा पहन कर वह असली गरु बन ही गये। वैसे दादा गुरु से ज़्यादा यूनियन लीडर नज़र आते थे।
सबके दादा, हरीश जौहरी, मेरे मुँह बोले बड़े भाई और मार्ग दर्शक थे। मेरा उनसे १९५४ से साथ था। उनके बारे में जो कुछ कहा जाये वह कम ही बैठता है। वह दार्शनिक, चित्रकार, मूर्तिकार, लेखक, वक्ता, शिक्षक, रसोईये, वामपंथी, संगीतज्ञ, मित्र, यायावर, नाटककार, बहुत सीधे साधे, बहुत तीव्र बुद्धि वाले और गूढ़ से गूढ़ बात को सीधे तरीके से समझा देने वाले व्यक्ति थे। और साथ ही साथ बड़े मज़ाकिया भी थे। किसी भी फूले हुये का गुब्बारा फोड़ देना उनके बाँये हाथ का काम था। टीका, त्रिपुन्ड, रुद्राक्ष मंडित, रंग बिरंगे वस्त्रों से सजे और चेले चाटिंयों से घिरे स्वयं कथित गुरु और भगवान, हरीश भाई के पासंग बराबर नहीं हैं।
गूगल मे अगर हरीश जौहरी नाम डाला जाये तो एक लाख से ज़्यादा संदर्भ आ जाते हैं। बरेली में अब शायद ही १५-२० लोग उन्हें याद करने वाले हों। इसक कारण यह है कि उनकी कर्मभूमि सारा विश्व रहा और मातृभूमि बरेली रही। बरेली में वह गुलाब नगर वाले मामूली हरीश जौहरी ही रहे।
मैं १९५३ में हाईस्कूल पास कर इन्टर की पढ़ाई करने रामपुर गया। अगले साल एम ए या डबल एम ए करके हरीश भाई भी रामपुर आये। उनके पिताजी उस समय वहाँ जज थे। रामपुर का किला मेरे घर और कालेज के बीच में था और मैं रोज़ दोनों समय उसमे से हो कर आता जाता था। रामपुर का किला काफ़ी बड़ा और सुन्दर है। इसके एक बाग़ में दुनिया भर से मँगा कर गुलाब के फूल लगाये गये थे। आज़ादी से पहले तो शायद कोई कोई ही किले में जा सकता था पर उसके बाद तो यहाँ सबको जाने की छूट मिल गयी। महल सरकारी अफ़सरों के रहने के घर बन गये। शायद इन्हीं किन्हीं मे उनके पिता जी भी रहते थे। मैं आते जाते यह देखता था के एक आदमी घूम घूम कर फूलों से बात करता है। मुझे आशचर्य तो हुआ पर बात करने की हिम्मत नहीं हुई। एक दो महीने तक यही देखता रहा तो मुझसे रहा नहीं गया और मैने उनके पास जा कर पूछ ही डाला कि वह फूलों से क्यों बात करते हैं। वह बोले के अरे क्या तुम नहीं करते। मैंने कहा कि क्या फूल बोलते हैं। वह बोले कि हाँ और जिस दिन फुलों की बात समझ में आने लगेगी तो बहुत समझदार हो जाओगे। बाद को पढ़ा कि जगदीश चन्द्र बोस के अनुसार पेड़ पौधे भी जीवधारी होते हैं। अगर होते हैं तो इनकी भी कोई भाषा अवशय होती होगी। मुझे तो अभी तक नहीं आई है पर क्या पता एक दिन गुलाबों का सन्देशा मुझे भी आने लगे। इसके बाद उनसे एक तार सा बँध गया। १९५९ में मैं बरेली कालेज में पढ़ने आया। हरीश भाई भी तब तक बरेली आ गये थे। उनके पिता जी का देहान्त हो चुका था और बड़ा पुत्र होने के कारण अच्छे भरे पूरे परिवार का भार उन्हीं पर था।. फूलों की भाषा समझने वाले को दाल आटे का भाव पता करना पड़ा।
अगले ४-५ साल उनके लिए बड़े मुशकिल के रहे। उन्होंने तरह तरह के काम करने की कोशिश की। कभी खिलौने बना कर बेचने की कोशिश की तो कभी तस्वीरें बना कर बेचने की कोशिश की। दुनियादार बनने की तमाम कोशिशें नाकाम ही रहीं। पैसे की न तो उन्हें समझ ही थी और न ही उससे कुछ ज्यादा मतलब ही था। बस एक मजबूरी थी क्योंकि भाई बहन और माँ थी। कहीं से एक हनुमान जी की मूर्ति बनाने का काम मिला। यह हनुमान जी की मूर्ति बिहारीपुर ढाल पर आज भी है। उनका हनुमान प्रेम यहीं से शुरु हुआ। एक समय में वह बड़े भयंकर कम्यूनिस्ट थे। वह पीपुलस थियेटर के लिये एक एक पैसा ले कर चन्दा करते थे। वह पैसा भी उन्हें तभी मंज़ूर होता था जब वह आपको इसके ध्येय से प्रभावित कर दें। अब इस काम में चाहे एक घन्टा लगे या दो या चार। जब हनुमान की मूर्ति बनी तो फिर उन पर ऐसी कृपा हुई कि शहर शहर में जा कर उन्हें यह काम करना पड़ा। उनकी एक मूर्ति कानपुर के एक ख़ास चौराहे पर भी लगी। अब वह वहाँ है या नहीं मुझे पता नहीं। उनकी बनाई शिव भगवान की प्रतिमा और अशोक वाटिका बरेली के गौरी शंकर मन्दिर में अभी भी है। बाद को यही गौरी शंकर का मन्दिर उनका अड्डा भी बना। बरेली का अपना समय वह सदा यहीं बिताते थे। वहाँ के बरामदे में एक तरफ़ जटा जूट धारी भभूत मंडित बाबा लक्षमण दास बैठते थे और दूसरी तरफ़ यूनियन लीडर के बाने वाले दादा। दादा का पहनावा सफ़ेद कुरता पजामा, बंडी और गले में लिपटा मफ़लर रहा चाहे बरेली में हो या न्यूयार्क में हो चाहे हौलैन्ड में हो। इसमें कभी फ़र्क नहीं आया।
१९६२ या ६३ में मेरी ही एक सहपाठी प्रतिभा से उनका विवाह भी हो गया। पता नहीं इस बमभोले गौरी शंकर में लोगों को क्या दिखा कि यह काम हुआ। इनके पास कुछ काम धाम या आमदनी का ज़रिया तो था नहीं। शादी के बाद इन्हें नौकरी की तलब हुई और इनके किसी प्रेमी ने इन्हें बरेली के पास बन रही रबड़ फ़ैक्ट्री में काम दिलवा दिया। १९६३ में ही मैं भी अपनी पढ़ाई समाप्त करके पास में ही बन रही कैम्फ़र फ़ैक्ट्री में लग गया। मेरा दादा से काफ़ी सम्बन्ध रहता था और मेरे रबड़ फ़क्ट्री के दोस्तों इनकी ख़बरें भी मिलती रहती थीं। वहाँ इन्होंने काम तो कुछ किया नहीं पर इनके प्रशंसक ख़ूब बने। यह नौकरी १२-१४ महीने से ज्यादा नहीं चली। फिर वही ९९ का फेर चलने लगा। ९९ पैसे का एक रुपया कभी नहीं बन पाया।
तरह तरह के पापढ़ बेले गये। इधर उधर चारों तरफ़ हाथ मारे गये। पर वही ढाक के तीन पात। फिर कहीं से यह बात मन में आई कि पैसे के फेर में नहीं पड़ना है। हमारे यहाँ एक कहावत है कि अगर लक्ष्मी के पीछे भागो तो वह हाथ नहीं आती है। लक्ष्मी उसी के पीछे भागती है जो उससे दूर भागता है। एक दिन बड़े विस्तार से उन्होंने यह बात मुझे बताई थी और अपने पैसे को हाथ न लगाने के निशचय से मुझे परिचित कराया था। मैंने इसे उनकी पिनक ही समझा पर मैंने यह सोच कर कुछ बहस नहीं की कि यह बुख़ार जल्दी ही उतर जायेगा।
पाठक आप मानें या मानें इसके बाद दादा ने कभी पैसा अपने हाथ से नहीं छुआ।अब यह हनुमान जी ही जाने कि वह कैसे सारी दुनिया में घूम आये। इसके बाद कुछ ऐसे बानक बने कि बस कमाल हो गया। अमरीका से एल एस डी के शोधक और हिप्पीडम के एक जनक, हार्वड के मनोशास्र् के प्रोफ़ेसर श्री रिचर्ड एलपर्ट भारत आये और न जाने किस सुयोग से दादा से टकरा गये। इनकी भारतीय धर्म और दर्शन में रुची हो गयी थी। इनका मत था कि सिद्धी की मनोस्थिति प्राप्त करने लिये बरसों बरस साधना करने की कोई अवश्यकता नहीं। यह स्थिति एल एस डी की एक गोली से ही प्राप्त हो सकती है। दादा इनके गाइड बने और इन्हें ले कर भारत नैपाल के सभी तीर्थ स्थानों पर गये और साधुओं गुरुओं से इनका परिचय कराया। इन्हीं मुलाकातों में से इनकी एक मुलाकात मेरे गुरु नीम करौली बाबा से भी हुई। इन्होंने उन्हें भी अपनी चमत्कारी गोली से प्रभावित करने की कोशिश की। बाबा ने इनसे यह गोलियाँ माँगी। इन्होंने बाबा को दो गोलियाँ दीं और कहा कि यह बहुत ज़्यादा हैं। बाबा ने इनके हाथ से पूरी शीशी छीन ली और पूरी १०० गोलियाँ अपने गले से उतार लीं। रिचर्ड घबरा गये कि बाबा तो मर ही जायेंगे। पर बाबा वैसे ही बैठे हँसते रहे। रिचर्ड बाबा के चेले और भक्त बन गये और अब सारी दुनिया में बाबा रामदास के नाम से मशहूर हैं।
इसी द्वार से दादा का भारत से जाने का सुयोग हुआ। एक बार जो गऐ तो ऐसे छाये कि फिर पूरी दुनिया ही उनकी कार्यस्थली बन गयी। वह हर वर्ष होली से दिवाली तक अमरीका, हौलैंड, जर्मनी और मैक्सीको में रहते थे और दिवाली से होली तक बरेली में या भारत भ्रमण पर। इनके चेले चाँटी या स्टुडेन्ट अक्सर इनके गुलाब नगर वाले टूटे फूटे मकान में देखे जाते थे। बड़े बड़े रईस यहाँ आये और उसी घर में रहे। बरेली की गन्दी गलियों में घूमे और आँगन में चारपाईयों पर सोये। दादा सोते बहुत कम थे और हमेशा कुछ न कुछ करते रहते थे।
अपने को चित्रकार ही ज़्यादा मानते थे। सिल्क पर वाटर कलर वाश इनका मुख्य मीडियम था। यह कठिन प्रक्रिया है। इसमे पेन्टिंग बना कर धो दी जाती है और फिर बनाई और धोई जाती है। ऐसा चार, छह, दस या बीस बार तक होता है। यह बड़ी लगन का और धैर्य का काम है। दादा इसे साधना समझ कर करते थे। इनके अनेक विद्यार्थी आज भी मनोयोग से इस काम में लगे हैं। उनके बनाये देवी देवताओं, राग रागनियों, नक्षत्रों और चक्रों के चित्र बहुत मनोहारी हैं और शास्त्रिय विधि से बनाये गये है। उनके बनाये गणेष, सरस्वती और काली के चित्र मेरी अमूल्य थातीयाँ हैं। उनकी इन्टरनेट साइट पर यह अधिकांश चित्र सहज ही सुलभ हैं।
दादा बहुत सुबह उठ कर पूजा करते थे। यह पूजा सुल्फ़े की एक सिगरट से शुरु होती थी। उसके बाद भिगोया हुआ बादाम घिस कर काली मिर्च से साथ चाटा जाता था। फिर रोज़ हनुमान जी की एक तस्वीर बनायी जाती थी। हर दिन एक ही तस्वीर। दादा कहते थे कि इस रियाज़ से पता चलता रहता है कि हाथ कितना सध रहा है। मैने उन्हें अनेक बार स्कैच करते देखा है और ऐसा पक्का लाइन का काम और कहीं नहीं देखा है। इस काम में इनके पहले गुरु बरेली के आर्ट टीचर मास्टर चन्द्रबल जी थे। गुरु तो गुरु थे पर चेले मिश्री की डली बन कर निकले। इस टक्कर का काम मेरे दूसरे मित्र जयपुर वाले श्री वीरेन्द्र नारायन जी ही कर सकते हैं। यह भी शान्तिनिकेतन के गुरु नन्दलाल बोस के प्रिय शिष्य हैं और किसी कला साधक योगी से कम नहीं हैं। मेरा एक बड़ा सौभाग्य है कि इन दोनों का बहुत सा काम मेरे पास है।
इस साधना के परिणाम स्वरुप साल में ३६५ हनुमान चित्र बन जाते थे। दादा साल में एक बार यह सब चित्र ले जाकर ऋषिकेश में गंगा में प्रवाहित कर देते थे। गंगा प्रसन्न हो कर दो या तीन चित्र उन्हें लौटा देती थी। इन चित्रों में एक अवर्णनीय दैविक शक्ति है। इनमें से दो चित्र मेरे पास हैं और इनसे क्या क्या काम बने हैं यह फिर किसी और दिन बताऊँगा।
दादा की एक बड़ी बात यह थी कि वह भाषण में विशवास नहीं करते थे। उनके आस पास जो भी होता था वह उनके किसी काम में ही लगा दिया जाता था। बेकार के काम। आलू काट लो। आटा माढ़ लो। तस्वीर बना लो। चक्रों में रंग भर लो। और इन्हीं के बीच बड़ी गम्भीर वार्ताऐं चलती थीं। दाद खाना बनाने में बड़े माहिर थे। जहाँ भी हों खाना ख़ुद ही बनाते थे और सबको खिलाते थे। हमेशा एक भी़ड़ किचन मे लगी रहती थी। मेरे विचार से इनकी शाकाहारी भोजन बनाने की किताब इस विषय की सबसे अच्छी किताब है। इसमें हर तरकारी, फल और मसाले के गुण दोष समझाऐ गयें हैं और यह आयुर्वेद शास्त्र पर आधारित है।
हमारे तंत्र मंत्र और चक्रों पर लिखी गई इनकी किताबें जग प्रसिद्ध हैं। यह खेल खेल में और हँसी मज़ाक के बीच कब लिख गईं मै नही जानता। मेरा यह लेख लिखने का ध्येय उनका जीवन चरित्र लिखना नहीं है। यह सब जानकारी तो आप इन्टरनेट पर जा कर स्वयं ही ले सकते हैं। मेरे मन में जो बातें अटक गई यहाँ उन्हीं की बात कर रहा हूँ।
बात चाहे कितनी भी कठिन हो, कितनी भी गम्भीर हो लेकिन उनके चेहरे पर एक शैतानी भरी हँसी रहती थी और हर बात पर ज़ोर ज़ोर से हँसना उनकी आदत थी। लोग बड़े सीरियस हो जाते हैं। अपने ही तर्कों के जाल में फँस कर रह जाते हैं। एक विचारक का काम सब बन्धनों से छुट कर खुले तरीके से समझी समझाई बातों के ऊपर और आगे जाना है।
गहरी बातों को हल्के फुल्के लेना और मामूली लगने वाली बातों को गहरी नज़र से देखना ही अक्लमन्दी है। भाषण तो तमाम दिये जा चुके हैं। आत्मा परमात्मा, नर्क स्वर्ग और निर्वाण के ऊपर तो बहुत बातें हो गईं हैं पर दलवाज़े पर कूड़ा वैसा ही पड़ा हुआ है। हरीश भाई झाड़ू लगाते हुए ही आत्मा परमात्मा की बातें करना पसन्द करते थे।
मैं हरीश भाई की तरह पैसे को हाथ न लगाने का नियम तो नहीं निभा सका पर यह ज़रुर हुआ कि मैं काम और पैसे को मिला कर नहीं देखता। पैसे आज तक कभी न माँगे है.न ही पैसे की आशा से कोई काम करता हूँ। लक्ष्मी मेरे पीछे पीछे तो नहीं भागी पर कभी कभी कुछ छुट्टा चिल्लर मुझ पर निछावर ज़रुर कर देती है और मैं भी उसे उसी अदा से लुटा भी देता हूँ। पानी बाढ़े नाव में और घर में बाढ़े दाम, दोनों हाथ ऊलीचिये यही सयानो काम। |