o यह भी क्या कोई लिखने की बात है।
o आत्म निवेदन
o प्रतीक्षा
o सूरज है सिन्दूरी
o पिया और पपीहा
o उलझन
o उदासीनता
o हरीश गुरु
o आदि गुरु
o मेरा संगीत का सफ़र
o किताबें ही किताबें
o छपने छपाने की बात
o मैं बोलता क्या हूँ?
o सठिया जाने का मामला
o जादूगर गुरु
o मदारी दरवाज़े की बात
o कुछ कहने न कहने की बातें ।
o समझता तो हूँ पर कहता नहीं हूँ
o मै खाता क्या हूँ
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लेख कविताऐं



आदि गुरु

हमारे यहाँ गुरु की बहुत महिमा है। गुरु को ब्रम्हा और विष्णु की श्रेणी में रखा गया है। कबीर दास जैसे प्रथा विरोधी भी कह गये कि गुरु और गोविन्द में गुरु ही महान है जिसने बता दिया के सामने खड़ा दूसरा कोई और नहीं स्वयं गोविन्द हैं। गुरु हर देश में और हर वेश और हर पेशे में हैं। अधिकतर गुरु पेशे वाले ही हैं।

यह भी कहा जाता है कि गुरु किया नहीं जा सकता। यह कोई वह चीज़ नहीं है कि बाज़ार में मोल मिल जाये। मीरा को शायद मिल गये हों क्योकि उन्होंने गाया भी है कि माई री मैने लीने गोविन्दा मोल। सही पात्र को ही सही गुरु मिलता है और वह स्वयं ही कही. से आ कर चेले को दीक्षित करता है। वैसे तो गुरु गली मोहल्ले घूम रहे हैं कि कोई चेला फँस जाये तो कुछ दूध मलाई का और फर्स़्ट क्लास टिकट का प्रबन्ध हो जाये। मोटी आसामीयों की तलाश रहती है। मेंने यह कभी नहीं देखा कि किसी गुरु ने किसी रिक्शा तांगे वाले को चेला बना लिया हो। कोई भी कायदे का गुरु रिक्शा में बैठ कर नहीं चलता है।

पाँच सितारा गरु तो रुपये वाले चेले भी स्वीकार करने से कतराते हैं। बिना डालर के यहाँ दाल नही गलती। एक समय आया कि हर गुरु भारत से बाहर विदेशों की तरफ. रुख़ करने लगा के डालर के ४ रुपये बनें। जी हाँ मैं जिस काल की बात कर रहा हूँ तब अमरीकी डालर ४ रुपये का ही था। अमरीका में भारतीय गुरुओं की भरमार लग गयी। इतने गुरु हो गये कि चेलों का अकाल पड़ गया। हर गुरु का एक ही नारा होता था। माया मोह त्यागो, लालसा छोड़ो और सब व्याधियों की जड़ पैसे को हमारे पास रखवा दो। हमारे आश्रम में आ कर रहो और भजन ध्यान में मन लगाओ। होशियार गुरुओं ने पहाड़ों में वातानुकूलित आश्रम बना दिये और पाँच सितारा होटलों के दाम माँगने लगे। इन जगहों पर काले हिन्दुस्तानी का स्वागत न था। विदेशी महिलाओं का बहुत ज़्यादा स्वागत था। गुरु की मोहिनी का इन पर जल्दी असर होता था। पुरुष तो अधिकतर अपना काम छोड. कर अपने पैसे से आते थे पर महिलाऐं अपने पिता या पति के पैसे से आती थीं और उसका त्याग करते उन्हें बहुत ज़्यादा दर्द नहीं होता था।

एक बड़े महाऋषि स़्विटज़रलैंड की पहाड़ियों में डेरा डाल कर बैटे। इन्होंने नारा लगाया के अगर कुछ लाख लोग बैठ कर इनके ढंग से ध्यान लगा लें तो विश्व भर में शान्ति हो जायेगी। गोली बन्दूख़ लड़ाई दुशमनी सब भूतकाल की बाते हो जायेंगी। एक गुरु ने तमाम लोगों के सर मुँडवा कर उनके हाथ में ढोलक खड़ताल पकड़ा दिये और कहा कि तुम दुनिया भर के एयरपोर्टस में जाकर नाचो और प्रेम का सन्देश बाँटो। एक बच्चा गुरु भी आये और लोगों को मुक्ति का मार्ग दिखाने लगे। इनके साथ इनका पूरा परिवार भी माल लूटने खसोटने के लिये चलता था। माल के बँटवारे को ले कर घर वालों में वह सर फुटव्वल हुआ कि बाल भगवान बहुत ही जल्दी नाटक से मुक्त कर दिये गये।

एक गुरु इस बात के लिये प्रसिद्ध हुऐ कि वह मुक्त सैक्स में विशवास करते थे और मानते थे सब शर्म हया छोड़ने पर ही भगवान का दर्शन होगा। इस काम को सरल बनाने के लिए इन्होंने स्वयं को ही भगवान का दर्जा दे दिया और सुबह शाम मोटे पैसे ले कर अपने नंगे चेले चेलियों को सुबह शाम दर्शन देने लगे। बहुत पैसे वाले ठलुऐ इनके यहाँ जमा हो गये। इन्में बहुत से ऐसे फ़िल्म हीरो भी थे जिनको काम मिलना बन्द हो गया था। नशे पानी का भी यहाँ समुचित प्रबन्ध था। नशे में बेशर्म होना आसान हो जाता है।
इनको देश छोड़ कर बाहर भागना पड़ा। वहौँ जा कर इन्होंने एक पूरा नगर ही ख़रीद लिया और रोल्स रायस कारों का व्यसन अपना लिया। इनके प्रेम में अन्धे हो कर इनके भक्तों ने इन्हें असंख्य रोल्स रायस कारे दे डाली। ऐसी एक कार उस समय करीब डेढ. लाख डालर की आती थी। इनके अनुयायी दंगे फ़साद और मर्डर करने लगे। उनकी शर्म हया और डर सब दूर हो चुके थे। गुरु को एक दिन बड़े बेआबरु हो कर इस कूँचे से निकलना पड़ा और बड़ी बदनामी की हालत में अपने ईश्वर से मिलने गये। मुझे पता नहीं कि असली भगवान ने इस नकली भगवान का कैसे स्वागत किया और वहाँ कैसी कालकोठरी उन्हें रहने को मिली। नचाने वाले प्रभूपाद के चेलों ने बड़े शानदार मन्दिर जगह जगह बनवा लिये हैं और अब गुरु के स्वर्गवास के बाद जूते चला रहे हैं और मन्दिरों में ताले पड़वा रहे हैं।

गुरु अब फ़ैशन से बाहर हो गये हैं। लोगों ने इन्हें अपनी धन सम्पदा सौंपने से अच्छा यह समझा है कि इसे शेयर मार्केट के दलालों को सौंपना कहीं अच्छा है। इसमें कुछ तो सम्भावना रहती है कि अगर पैसा डूबा भी तो थोड़ा तो बच ही जायेगा। दीन मिले या न मिले थोड़ी बहुत दुनिया तो बच ही जायेगी।

मेरे बचपन के दिनों में गली मोहल्लों में बड़े साधू आया करते थे। इसमें से अधिकतर बद्रीनाथ के दर्शन को जा रहे होते थे और तरह तरह के सवाल करते रहते थे। यह उसी समय आते थे जब घर के मर्द दफ़तरों दुकानों में जा चुके होते थे। धर्मभीरु महिलाऐं इनके सवाल पूरे करती रहती थीं। एक बार मैने एक १० साल के बच्चे को भी पूरा बाबा बना देखा। इसको सन्यास का भूत चढ़ गया था और यह ईश्वर दर्शन से कुछ घन्टे ही दूर था। बड़े बूढे भी इसके पैर छू कर इसे दान दक्षिण देते थे। कहीं थोड़ी दूर ही कोई इसका भी गुरु इसकी दिन भर की कमाई हड़पने के ध्यान में मग्न रहता था।

पाठक मुझे भी धुन लगी कि जब सब लोग गुरुओं को ढूँढ रहे हैं तो मैं भी कोई गुरु खोजूँ। मैं उस समय ग़रीब विद्यार्थी था और किसी बड़े गुरु की पूजा अर्चना की मेरी सामर्थ्य नहीं थी। मुझे तो रोली चंन्दन फूल जुटाना ही भारी पड़ता। मैंने इस काम में अपने एक मित्र की मदद लेनी चाही तो वह मुझ पर बड़े भारी पड़े। पूछा कि सब गुरुओं का गुरु कौन। किसने ईजाद की यह मुफ़्त दूध मलाई खाने की परंम्परा। किसने आदमी के हृदय में डर बिठाया और कहा कि उसे मुक्ति का प्रयास करना है और इस कठिन काम के लिये उसे किसी ठग का मार्ग दर्शन चहिये। मुक्ति तो देर सबेर न चाहने पर भी सभी की हो ही जाती है। किसी की ट्रक के नीचे दब कर तो किसी की अस्पताल के पलंग पर। इसी ज्ञान के लिए भगवान बुद्ध को जीवन मरण का खेल खेलना पड़ा। उनका कोई गुरु नहीं था। उन्हें यह ‍ज्ञान एक पेड़ के नीचे स्वयं ही हो गया। बड़े बड़े मुनी जंगल पहाड़ों कन्दराओं में बैठे ध्यान मनन करते रहे और समाधि को प्राप्त हुए।

मुझे भी अनायास ही मेरे गरु ने कहीं से आ कर पकड़ ही लिया और यह गुरु मंत्र दिया कि प्रकृति ही पुरुष का गुरु है। आदमी आदमी को क्या देगा। पानी हवा सूर्य चाँद तारे दिन रात ही हमारे गुरु हैं। सरा ज्ञान प्रकृति के नियमों मे ही निहित है। हम अपने आसपास ऊपर नीचे देखते रहें और समय की चाल को ध्यान से देखते रहें तो सब ज्ञान स्वयं ही आ जाता है। चाँद सूर्य तारे कोई फ़ीस नहीं लेते और न ही कोई दक्षिणा ही माँगते हैं। और सब ज्ञानों का ज्ञान भी यही है कि कुछ नहीं से कुछ नहीं तक का ही सफ़र है। धूल में ही जन्म ले कर धूल में ही मिलना है। अब जो थोड़ा सा समय हमारे पास है उसमें इसी धूल से चाहे कितने ही खिलौने बना लें।

मेरे आदि गुरु की यही शिक्षा और सन्देश है। तेज़ हवा ने मुझसे पूछा, रेत पे क्या लिखते रहते हो।



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