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शाशवत की अभिव्यक्ति समझ लूँ, मुस्कानों की शक्ति समझ लूँ, अपना रोना रोते रोते, कितने अश्रु परस्त हो गये।
इन से उन से सब से बोलो, हर पीड़ा के बन्धन खोलो, भीतर भीतर जलते जलते, कितने सूरज अस्त हो गये।
गली गली में आते जाते, रोज़ प्रेम की अलख जगाते, उनकी खिड़की खुलते खुलते, बम भोले मद मस्त हो गये।
तर्क धार से कटते कटते, अर्थ जाल में फंसते फंसते, हर सूली पर चढ़ जाते हैं, हम इतने अभ्यस्त हो गये।
जीवन के ज्वारों भाटों में, लहरों पर तिरते उतराते, तट को जब आना हो आऐ, हम तो स्वयं तटस्थ हो गये। |