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बेले की पंखुड़ियों पर शबनम धूप तापती है, भौंरौं की गुनगुन में यह कैसी व्यथा व्यापती है।
पत्तियाँ बजाती झाँझर, झींगुर पीर सुनाते हैं, छाया पेड़ों से अलग किसी के राह नापती है।
सुप्रभात का बादल क्या सन्देशा लाता है, कोयल की आवाज़ किसलिए आज काँपती है।
ख्यालों ही ख्यालों किस प्रीतम के चर्चे हैं, सांस लाजवंती की हरदम क्या पुकारती है।
जाने किसके स्वागत में सूरज है सिन्दूरी, मन मन्दिर में होती किसकी रोज़ आरती है। |