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चंन्द्र किरणों मे नहा कर, दुख भरी धुन गुनगुनाऐं, झिलमिली तारों के दुनिया, आसुओं की ओट लाऐं।
रात शीतल है बहुत, आग साँसों में लगा लें, कैसी हलचल है हवा में, आस के दीपक जला लें। अपनी आहों से किसी की, बाँसुरी के स्वर जगायें।
शवेत चादर की सलों में ज़िन्दगी की राह ढूँढ़े, कल कहाँ सूरज उगेगा, रातरानी से यह पूँछे। एक करवट में सिमट लें, न सुने कुछ न सुनायें।
अपने जीवन के सफ़ों में, शोधनों के चिन्ह ढूँढ़े, लाल स्याही में छुपाई, अपनी ही कालिमा छू लें, धूल इतिहास की अपने, फूँक भर भर के उड़ाऐं।
चंन्द्र किरणों मे नहा कर दुख भरी धुन गुनगुनाऐं।
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