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शोर शब्दों का समझ पाया नहीं, भाषणों का अर्थ मन भाया नहीं, नींद मेरी और गहरी हो गयी, झर गये मेरे नयन के सब सपन।
बात उससे की तो वह समझा नहीं, अपनी कहता था मेरी सुनता नहीं, कहने सुनने की रही अब बात क्या, अब न साजन है कोई न मैं सजन।
क्षत विक्षत है सत्य तर्कों घिरा, शास्त्रार्थों से थकी जिव्ह्या मेरी, प्रशन मन में और अब उठते नहीं, उत्तरों से भर गया मेरा गगन। |