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अपने बारे में लिखने की सोचता हूँ तो सोचता ही रह जाता हूँ। हज़ार पंद्रह सौ दिनों की कथा कुछ ही शब्दों में कैसे सिमट सकेगी? जो दिन कभी क्षण क्षण भारी पड़ते थे वह हल्की फुल्की यादों के बतियाने से कैसे साकार हो सकेंगे? क्या क्या छोड़ना पड़ेगा? कौन सी बातें पाठकों को अच्छी लगेंगी? यदि यही सब है तो दूसरों के मनोरंजन के लिये मैं ही क्यों अपनी पर्त पर्त उधेड़ने लगूँ। वैसे तो बहुत सी बातें अब याद भी नहीं हैं और अब उन्हें याद करने का कोई मतलब भी नहीं है। कुछ बातें इस प्रकार की भी हैं कि जिन्हें मैं ख़ुद भी याद रखना नहीं चाहता पर वह मुझे छोड़ने का नाम नहीं लेती।
इसी प्रकार की कुछ यादों को मन के कन्सटर से निकाल कर फेंक रहा हूँ। पाठक, इस कचरे में आपकी में आपकी क्या रूचि हो सकती है? यह तो मेरी अपनी अतंरंग बातों में से एक है और मैं इसे अपनी यादों का बोझ हल्का करने के लिए ही यहाँ लिख रहा हूँ। अब आप चाहें तो इस प्रसंग से बाहर जा कर कहीं और अपना मनोरंजन कर लें। यह मेरी अपनी कमज़ोरी है कि अब मैं इस प्रसंग से अभी बाहर नहीं निकल सकता।
अगर आप कभी बरेली के रेलवे स्टेशन से गुज़रे होंगे तो आपने यह चाय कम्पनी का पुराना बोर्ड ज़रुर ही देखा होगा जो सब आने जाने वालों को बताता था कि यह शख़स और इसका भाय पीता है हमेशा चाय। यह अलीगढ़ में बना हुआ ऐनामल का बोर्ड था जिस पर एक हिन्दू का पगड़ी वाला और एक मुसलमान का र्तुकी टोपी वाला चेहरा बना था। यह बोर्ड या तो अपने विचित्र व्याकरण या अपने सेक्यूलर सन्देश के कारण अभी तक मेरी यादों का हिस्सा बना हुआ है। इस सन्दर्भ में आपको यह भी बता देना चाहिये कि भारत अभी आज़ाद नहीं हुआ था और नेहरु जी अभी सेक्यूलर शब्द का निर्माण नहीं कर पाये थे या कम से कम यह भारत के जन मानस पर अभी थोपा नहीं जा सका था। लेकिन चाय के इस बोर्ड को ले कर वर्तमान की राजनीति में भिड़ने का समय अभी नहीं आया है। बात कहने की यही थी कि इस बोर्ड ने मेरे बाल मन को बाँध लिया था।
पाठक, आप चाहे बरेली न भी गये हों पर आपने यह बोर्ड यूनाइटेड प्रोविन्स में जगह जगह लगे देखे होंगे। उत्तर प्रदेश का निर्माण अभी नहीं हुआ था और चाय अभी भारत का प्रिय पेय बनने का सौभाग्य नहीं प्राप्त कर पाई थी। और फिर मेरा परिवार तो अभी दूध जलेबी के नाश्ते से आगे तरक्की नहीं कर पाया था। चाय यदा कदा बाहर से आने वालों के लिये बन जाती थी पर यह बच्चों के मतलब की चीज़ तो बिलकुल भी नहीं समझी जाती थी। मेरे बड़े मामा के अनुसार चाय और भंग पीने में कुछ ख़ास अन्तर ना था।
पर आप अब तक समझ ही गये होंगे कि मेरे मन पर स्टेशन वाला बोर्ड पूरा असर के चुका था और मैंने किसी न किसी प्रकार से चाय सेवन का प्रबन्ध अवश्य ही किया होगा। आपका यह सोचना व्यर्थ नहीं है पर मैं इस बात का श्रेय नहीं ले पाऊँगा। यह श्रेय मेरी दिवंगत मामी जी को जाता है जिन्हें मैं सदा माँई जी कह कर बुलाता था। यह माँई जी मेरे मामा जी से इतना डरती थीं के उनके सामने भी बड़ी मुशकिल से ही पड़ती थीं। वैसे मेरे मामा जी से घर के तो क्या आसपास और पड़ोस के सभी लोग डरते थे। बड़े ही विकट गुस्से वाले वकील थे मेरे मामा। हो सकता है आपने भी बरेली के नाग साहब वकील का नाम सुना हो। पर यह कहानी उनकी नहीं है और उन्हें अभी इससे बाहर ही रखना चाहिये।
जितना हमारे मामा और घर के दूसरे लोग चाय को मलाई वाले दूध, ओवलटीन, शर्बत, फलों के रस और ठंडाई आदि पेयों से हेय समझते थे उतना ही मेरी माँई जी को चाय से प्रेम था। बिना चाय के माँई जी का दिन शुरु ही नहीं हो पाता था। सुबह सुबह घर में चाय बनना एक असम्भव सी बात थी पर मैंने शीघ्र ही यह राज़ पता कर लिया के मेरी माँई जी किस समय सबसे छुप कर चाय बनाती थीं और अपने चौके के अभेद्य किले में निर्भय हो कर पीतीं थी। वैसे तो मैं अपने मामा जी का बड़ा ही प्रिय पात्र था और यहाँ तक कि कुछ लोग तो मुझे उनका भेदिया ही समझते थे। किन्तु मैंने अपनी चाय की ललक में अपनी माँई जी से एक अलिखित सन्धि कर ली कि अगर वह अपनी चाय में से मुझे भी हिस्सा देने लगें तो उनका यह भेद सदा सुरक्षित रहेगा।
पाठक, मैं काफ़ी समय मामा जी और माँई जी के पास रह कर पढ़ा और दोनों ने ही मुझे अपने बेटे की ही तरह माना। मैं जब तक बरेली में अपने मामा के घर रहा, दूध इत्यादि का नाश्ता सबके सामने करके, माँई जी के साथ छुप कर उनके चौके में सदा चाय पीता रहा। मेंने अपनी माँई जी से की हुई सन्धि की शर्त पूरी पूरी निभाई है और आज उनके मरने के अनेकों साल बाद ही यह तथ्य उजागर कर रहा हूँ।
माँई जी दिल्ली के एक बड़े जाने माने परिवार की लड़की थीं। उनके पिता जी अँग्रेज़ों के ज़माने में जज थे। मैं इस बात पर आज भी आशचर्य करता हूँ कि उनके लिए मामा जी का चुनाव किस कारण हुआ। किस पंडित ने जन्मपत्री या टेवा मिलाने में ग़लती की। कोई भी पंडित अपंडित मिनटों में ही यह जान सकता था कि यह जोड़ी किसी भी जोड़ की नहीं है। मामा जी जितने होशियार और भौतिक सुख सुविधाऔं के प्रेमी और रख रखाव वाले आदमी थे, मेरी माँई जी उतनी ही सीधी साधी और सरल स्वभाव वाली थीं। और अगर हमारे मामा जी के शब्दों में कहा जाये तो फूहड़ थीं। मामा जी के नज़र में यह फूहड़ता लगभग हर समय, या जब जब वह घर में रहते थे, प्रकट होती रहती थी। हम लोगों को उनके माँई पर चिल्लाने या दहाड़ने की आवाज़ अकसर ही सुनाई पड़ती रहती थी।
सुबह उठने से ले कर १० बजे तक का समय बड़ा ही कठिन होता था। आप समझ ही गये होंगे कि हमारे वकील साहब रोज़ ठीक १० बजे घर से कचहरी के लिए निकलते थे। यह घर से निकलना, पाठक, दो तीन बरातों के घर से निकलने से भी अधिक जंजाल वाला सिध्द होता था। अब यह बताने की बात नहीं है कि इस कठिन काल में माँई जी को मामा जी के आगे पीछे ही डोलते रहना पड़ता था। उनकी सब ज़रुरतों का और उनकी सब चीज़ों का पता उनको ही था और कैसे ढंग से सब काम करना चाहिये यह नहीं भी पता था। तो इसी जानने और न जानने के बीच में उनकी लानत मलामत होती रहती थी। वैसे तो इस समय माँई जी का मुख्य काम मामा जी को तैयार करके भेजने का ही था पर चौके में क्या हो रहा है यह देखना भी उनका ही काम था। अपने कमरे और चौके के बीच उनके बार बार आने जाने से बनी पगडंडी, पुराने घर के पक्की ईंट के आँगन में, आज भी देखी जा सकती है।
मेरी नानी जी और कुछ हद तक मेरी मौसी और बऊआ भी यही कहती रहतीं थीं कि भाभी जी के हाथ पैर मामा जी को देख कर ही फूल जाते हैं। और क्योंकि वह बड़े घर की लड़की थीं इससे उनको घर का काम आदि करने का उतना अभ्यास नहीं था जितना कि किसी मध्यम परिवार की लड़कियों को होता है। वैसे सब लोग उनके दुख में दुखी भी होते थे। बऊआ या मौसी जब जब भी बरेली में होती थी यही कहते सुनी जाती थीं कि हटिए भाभी जी मैं किये देती हूँ।
इस प्रकार की मदद् की ज़रुरत सुबह साढ़े नौ से दस के बीच में अधिक होती थी। मामा जी इसी समय खाना खाने बैठते थे। उस समय यह बात नहीं थी कि जो मिल गया उसे खा कर दफ़्तर भाग लिए। खाना और बकौल मामा जी के ढंग से अच्छा खाना खाना जीवन की परम अवश्यकता था। रहने सहने के तौर तरीकों में किसी प्रकार का समझौता करना मामा जी को अन्त काल तक नहीं आया। आप अवश्य ही समझ गये होंगे कि मामा जी और माँई जी दोनों ही अब इस दुनिया में नहीं हैं। अब आप यह पूँछ भी सकते हैं कि फिर अब यह अध्याय खोलने की क्या आवश्यकता थी। तो पाठक, मैं आपसे पहले ही कह चुका हूँ कि मैं तो अब इस प्रसंग में फँस ही गया हूँ पर आप यदि मुझे छोड़ कर जाना चाहें तो यह बड़ा ही अच्छा अवसर है।
अब तो यह लक्ज़री शायद ही कुछ लोगों को नसीब हो पर एक ज़माने में गरम गरम फुलकों का थाली में आना बहुत ही ज़रुरी था। फुलका चूल्हे से निकल कर फूला फूला ही थाली में पहुँचे यह हर सुखी ग्रहस्थ का परम अधिकार था। लोग भी चूल्हे के अरीब करीब ही बैठ कर खाना खाते थे। डाइनिंग रुम अँग्रेज़ों की कोठियों तक ही महदूद थे और हिन्दुस्तानी घरों में इनका कोई अता पता नहीं था। तो पाठक, गरम फुलके की बात चल रही थी। कुछ लोग तो यहाँ तक मानते थे कि अगर गरम रोटी न नसीब हुई फिर साली शादी करना का ही क्या फ़ायदा है। इस बात को ले कर कुछ घरों में तो मार पिटाई की भी नौबत आ जाती थी। ऐसा कभी हमारे घर में होने की नौबत तो नहीं आई पर यदि शब्दों से कोई चोट की जा सकती थी तो मामा जी ने उसमें कोई कसर कभी नहीं छोड़ी। मैं आज तक यह नहीं समझ पाया हूँ कि जब मामा जी खाना खाने बैठते थे तो तभी फुलके एक दम से फूलना क्यों बन्द कर देते थे। अब चाहे माँई जी जो भी जी चाहे उपाय कर लें, फुँकनी से चूल्हा फूँकते फूँकते आँखे लाल कर लें या चेहरा लाल कर लें, चूल्हे को पता नहीं क्या हो जाता था कि फुलके पिचके के पिचके ही रहते थे। गुस्से की गरम हवा और चूल्हे की लकड़ियों से उठक पठक भी इन बिना फूले फुलकों की कुछ मदद न कर पाती थी।
अब आप अगर अभी भी मेरे साथ हैं तो पूछ भी सकते हैं कि मैं अपनी पढ़ाई न करके इन सब बातों का गवाह कैसे बन गया। तो यह बात साफ़ ही है कि मैं चौके में चाय पीने गया था और समय रहते बाहर न निकल पाया। मामा जी अगर बाहर खाने बैठ गये हैं तो मैं उन्हें कैसे बता सकता था कि मैं पढ़ने के समय चौके में क्या कर रहा था। माँई जी से किये गये कौल के कारण मुझे मामा जी का खाना ख़त्म होने तक चौके ही में छुपा रहना पड़ता था। इसी कारण मैं अक्सर इन घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी रहा हूँ। इस दौरान मैं बाहर बैठे मामा जी की तो आवाज़ ही सुनता था पर माँई जी के आँसू और उनका दुख आमने सामने देखता था। उसी समय से माँई जी से सहानुभूति का और बाल सुलभ प्रेम का एक अटूट नाता बना।
वैसे बाहर बाहर और दिमाग़ से मैं मामा जी का ही भक्त रहा पर अन्दर ही अन्दर माँई जी का अप्रदर्शित दुख और भीतरी घुटन सदा ही मुझे भीतर ही भीतर सालती रही। उनके सब कुछ चुपचाप सहन करने की शक्ति पर जहाँ मैं पहले क्रोध था अब आदर से मस्तक भी नत करता हूँ। जब मैं छोटा था तब मेरी यह हिम्मत ही नहीं थी कि मैं खुले आम माँई जी के पक्ष में कोई आवाज़ उठा सकता। वैसे मेरी ही क्या घर में और किसी की भी यह हिम्मत नहीं थी कि माँई जी के पाले में जा कर खड़ा हो जाता। आगे भी यह हिम्मत कभी किसी की हुई भी नँही कि मामा जी के सामने हमारी छोटी सी प्यारी सी माँई जी का ज़रा सा भी पक्ष ले सके। वह स्वयं ही अपनी नाव खेते खेते तटस्थ हो गईं। उनके मूँह से मैने कभी कोई शिकायत नहीं सुनी। यह भी है कि स्वयं मैंने भी कभी कुछ जानने की बहुत कोशिश नहीं की।
मैं बड़ा हुआ तो दूसरी जगह पढ़ने चला गया। चाय पीना कोई शर्म की बात न रही। लोग तो शान से दाल में डलडा तक डलने लगे। मेरे हम उम्र लोगों को पता ही होगा कि कैसा बुरा ज़माना आ गया था। कलियुग का प्रथम चरण ही समझ लीजिए। वह चौके में छुप छुप कर चाय पीने का न तो कारण ही रहा और न ही अवसर। इस बीच मामा जी से सम्बन्ध और भी गहरा हुआ। उनके सांसारिक ज्ञान से, उनकी जमा की हुई मनमोहक चीज़ों से और उनके चीज़ों को समझने के ढंग से मैं और भी प्रभावित होता चला गया। सालों बाद किसी ने यह फबती भी कसी थी कि आपका लेखक तो बिलकुल अपने मामा जी पर ही गया है। मैं अभी यह समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि यह बात उसने ख़ुश हो कर कही थी या नाराज़ हो कर।
मामा जी पढ़ने लिखने के बड़े प्रेमी थे। सुबह ४ बजे वह अपनी मेज़ पर बैठ जाते और लिखने पढ़ने का काम करते थे। उनके पत्र सुलिखित और समाचारों से भरे रहते थे। उनसे मैने बहुत कुछ सीखा। जहाँ यह सीखा कि बाहर वालों को कैसे प्राभावित करना चाहिये वहीं यह भी सीखा कि क्या नहीं करना चाहिये। कम से कम अपने निकट के व्यक्तियों का दिल न दुखे ऐसा व्यवहार करना चाहिये। यह भी सीखा कि तीखा वचन और तेज़ आवाज़ एक आन्तिरिक घुटन के प्रतीक हैं और यह एक कमज़ोर आदमी के आभूषण हैं। मामा जी की क्या घुटन थी यह मैं पूरी तरह कभी नहीं जान पाऊँगा। मैं उनसे प्रभावित था और उनका प्रिय भी था। उनसे सदा बड़ा लम्बा पत्र व्यवहार भी मेरा चलता रहा। पर इतनी हिम्मत कभी नहीं हुई कि उनसे कोई अन्तरंग बात कर पाऊँ या उनके प्रति सहानुभूति प्रकट कर पाऊँ। यह उनके स्वभाव में भी नहीं था।
मैंने उन्हें किसी के प्रति सहानुभूति या कमज़ोरी दिखाते न कभी देखा न सुना। आज मुझे लगता है कि वह अपनी आशाओं और सामर्थ्य के अनुरुप सफ़ल न हो सके और शायद इसी कारण सदा कुंठित और गुस्सैले रहे। मैं अगर उन्हें काला अग्रेज़ कहूँ तो कोई अपमान न होगा। वह ग़लती से लन्दन में पैदा होने के बजाय बरेली जैसे छोटे नगर में फँस गये। तो इस प्रकार की स्थितियों से कैसे गुज़रते होंगे यह आपको बताना न होगा। और फिर फँसे भी तो कहाँ। बड़े बाज़ार के बीच में मौहल्ला मदारी दरवाज़ा में। अगर सिविल लाइनस में ही फँसते तो भी यह कुछ न कुछ उनके अनरुप होता।
जिनको मदारी दरवाज़े मौहल्ले में जाने का सौभाग्य नहीं मिला उन्हें अब यह बताना ही व्यर्थ है कि बरेली ही नहीं वरन् दूर दूर तक यह इलाका भारतीय खाने पीने की चीज़ों के लिये मशहूर था। अगर बरेली आ कर किसी ने मंगा मल हलवाई की मिठाई नहीं खाई या पन्ना मल कचौरी वालों के यहाँ भोजन नहीं किया तो उसका बरेली आना ही व्यर्थ माना जाता था। लौटते समय घर वालों के लिए लाला मंगा मल या लाला श्याम लाल की मिठाई और हज़ारी दूध वाले की खुरचन लिये बिना जाना अपनी आफ़त बुलाना ही था। यहाँ इन दुकानदारों की पबलिसिटी करने के मन से नहीं वरन् यह कहानी बढ़ने के हेतु ही यह सब कह रहा हूँ। वैसे तो पूरे शहर, आस पास और दूर दूर के लोग इन बरेली रत्नों के प्रशंसक थे पर हमारे मामा जी इन सबके वकील भी थे। इतने धनी और प्रसिद्ध सेठों के वकील होने के बाद भी एक पैसा कभी घर में नहीं आया। अलबत्ता ख़ाली दोनों और कुल्हड़ों का कूड़ा ही ज़्यादा जमा हुआ। आप जानते भी होंगे कि प्लासटिक के थैले अभी चलन में नहीं आये थे और सब चीज़ें पत्तों के दोनों और कुल्हड़ों में मिला करती थीं। इस सब का एक कारण यह भी था कि अक्सर माँई जी का बनाया हुआ घरेलू खाना इस मशहूर व्यंजनों से हार मान जाया करता था। मेरा एक काम भाग भाग कर इन दुकानों से सामान लाना भी था। तो अब तक आप लोगों को यह भी पता लग गया होगा कि मेरे मिठाई प्रेम की उत्पत्ति कहाँ से हुई है।
मुझे यह पक्का विश्वास है कि इन सेठों की हवेलियों में कई कमरे तो हमारे मामा जी के पैसे से ही बने होंगे। इन चक्करों में मामा जी के वकालत ख़ाने की मरम्मत भी ढंग से न हो पाई और एक दिन वह इन मिठाईयों और कचौरियों को दुआऐं देता हुआ बरसात में ढेर हो गया। ज़्यादा घी मिठाई खाने से मामा जी को कई बीमारियों ने भी घेर लिया। इसी मदारी दरवाज़े में और आस पास अपने समय के मश्हूर हकीम और वैद्य भी रहते थे। तब मैं नहीं सोच सकता था कि यह कोई मामूली संयोग नहीं था। समय का स्वभाव कि वह हम से आगे आगे तेज़ी से भागता रहता है और हम उसकी परछाँई ही पकड़ने की कोशिश करते रहते हैं। तो जैसे आप सबके पास भी होंगे, मेरे पास भी समय के बहुत से निगेटिव हैं। इस में जो चित्र दिखते हैं वह मुझ तक ही सीमित रहें तो बहुत अच्छा है।
बरेली अब वैसा शहर नहीं रह गया है। मैंने कई साल पहले जा कर देखा कि मदारी दरवाज़े की अब वह शान नहीं हैं। जैन्टलमैन लोग अब गली बाज़ारों में जाना भी पसन्द नहीं करते। यह जगह अब खाने का अड्डा भी नहीं रही है। वह चाय का बोर्ड भी अब नहीं है। पता नहीं उसका क्या हुआ। यहाँ कनाडा में तो वह ऍन्टीक काफ़ी अच्छे दामों मे बिक जाता। अब आप यह भी समझ गये होंगे कि मैने बहुत पहले ही भारत छोड़ किया होगा और मैं अब कनाडा वासी हूँ।
मामा जी से लगातार पत्र व्यवहार चलता रहा और माँई जी की याद भी मन के तहख़ाने में सुरक्षित रही। दिल्ली जब भी गया मामा जी से ख़ूब मिला, ख़ूब बातें की। माँई जी ने सदा वही पुराना व्यवहार किया। वही पुराने पकवान बना बना कर खिलाये। मेरे बचपन के प्रिय खाने बना कर वह मेरे स्कूल के दिनों के कटोरदानों मे भर कर दरवाज़े के पास वाली अलमारी में रख देती थीं। मैं वहाँ जा कर उन दोनों को नमस्कार करने और पैर छूने से पहले वह कटोरदान ही खोलता था। इससे मामा जी की डाँट फटकार भी सुनता था। चौके में बैठी माँई जी पर इस की क्या प्रतिक्रिया होती थी यह मैं कभी देख नहीं पाया।
मामा जी बरेली छोड़ कर दिल्ली चले ज़रुर गये पर जैसी आशा करते थे वैसा अपने को जमा नहीं पाये। मैं अन्दर की बात कभी जान भी नहीं पाया। वैसे मुझे आभास तो था ही कि मामा जी की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं है। पर इस पर भी उनकी आदतें पहले जैसी ही रहीं। उनके शाहाना व्यवहार और ज़रुरत से बढ़ कर ख़ातिर तवाज़ोह करने की आदत में कोई कमी नहीं आई। दिल्ली जैसे शहर में जहाँ कोई किसी को नहीं जानता है, मामा जी को चाँदनी चौक, फ़तेहपुरी और सदर बाज़ार के सब बड़े हलवाई बड़े आदर से देखते थे। मामा जी बड़ी दूर दूर जा कर अपने मेंहमानों के लिए अच्छे सा अच्छा माल ले कर आते थे। यह बात समय के साथ साथ ख़ातिर कराने वालों को भी खलने लगी। मेरी विदेशी पत्नी तक ने भाँप लिया के उनका यह व्यवहार अस्वाभाविक सा ही था। हम लोगों को तो इस सब की आदत पड़ चुकी थी पर मेरी पत्नी को यह सब एक नाटक जैसा ही लगता था। उनसे फिर भी कुछ कहने की हिम्मत किसी की नहीं रही। मैंने उम्र और सफ़लता में बढ़ने के साथ साथ बस इतनी हिम्मत ज़रुर कर ली कि किसी न किसी बहाने से वहाँ कुछ रुपये सदा ही छोड़ आता था।
बाद को यह पर्दा भी झीना होता चला गया। मामा जी मुझे लिखने भी लिखने भी लगे के उनकी आँखे अब उतनी अच्छी नहीं रही हैं और वह अपने ख़तों की ग़लतियाँ ठीक नहीं कर पाते हैं। यह भी लिखते थे कि मैं उनकी ग़लतियाँ स्वयं ही ठीक करके पढ़ लिया करुँ। यह उनके लिए जीवन की लड़ाई हार जाने से भी बढ़ कर था। पर समय से हमारे मामा जी जैसे दबंग लोग भी हार ही जाते हैं। मैं उन्हें आँखे ठीक कराने की सलाह देने लगा और इस आपरेशन के लिये पैसे भी भेजने लगा। यह क्रम बहुत साल चला। मेरा आख़िरी बैंक चैक भुनाने के पहले ही वह बिना अपनी आँखों का इलाज कराये ऊपर वाली अदालत में अपनी वकालत ख़ुद करने चले गये। वहाँ उन्हें अपने धरती पर और मेरी माँई जी के साथ किये गये व्यवहार की क्या सज़ा मिली यह जानने के लिए अभी मुझे काफ़ी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है।
यह बात मामा जी के सन्दर्भ में नहीं शुरु हुई थी। पर जब सब होते हुए भी माँई जी उनसे अलग न हो सकीं तो मैं ही उन्हें इस कथा से कैसे दूर रख सकता था। सच बात तो यह है कि मैं अपने मामा जी के बारे में कोई राय नहीं बना पाया हूँ। उनके ज्ञान से, उनकी शान से और उनके शौकों से प्राभावित रहा हूँ पर उनके गुस्से का, उनके असंवेदनशील तथा आत्मलिप्त व्यवहार का ध्यान आते ही मैं उनसे कोई सम्बन्ध तक स्वीकारना नहीं चाहता। उनके बारे में कई किताबें लिखी जा सकती हैं पर वह किसी को सुख नहीं दे पायेंगी। उनकी बात यहीं काट देना ठीक है।
बात तो पाठक बरेली स्टेशन पर लगे चाय के बोर्ड से शुरु हुई थी और कहाँ तक जा पहुँची है।
एक बार जब मैं दिल्ली से कनाडा उड़ान से पहले अपनी माँई जी के पैर छुने गया तो वह अपने किले में बैठी कलई के गिलास में चाय पी रही थीं। फिर तो पाठक, मेरे बचपन के दिन ही जैसे लौट आये और मै. वहीं एक पटले पर बैठ कर उनकी चाय में, अपनी पुरानी आदत के अनुसार ही, हिस्सेदारी करने लगा। यह उनका वह पुराना चौका न था पर चाय का स्वाद वैसा का वैसा ही था। गरम गिलास पकड़ने के लिए और कुछ आँखे भी साफ़ करने के बहाने जब जेब में रुमाल के लिए हाथ डाला तो कई सौ रुपये भी हाथ में आ गये। मैंने वह सब उनकी गोद में डाल दिये और उन्होंने बड़े ही चाव से उन्हें अपने पल्लू में बाँध लिया।
मैंने पहली बार ही कुछ रुपये सीधे उनके हाथ में रखे थे। आप सब जानते होंगे कि पुराने मर्द रुपये-पैसे अपने ही हाथ में रखना पसन्द करते थे। अब क्या जाने कि फूहड़ औरतें ठीक से हिसाब किताब कर भी पायेंगी या नहीं। हमारी माँई जी जज साहब की लड़की होने के नाते चिटठी पत्री लिखना और जोड़ घटाना जानती थीं। इसलिए जो कुछ रुपये उन्हें यदा कदा घर ख़र्च के लिए मिल जाते थे उनका हिसाब वह बड़े ही ध्यान से मामा जी के कचहरी से आते ही उन्हें दे देती थीं।
अभी मैं चौके से निकल ही रहा था कि मामा जी यह देखने आ गये कि मैने एयरपोर्ट जाने में देरी क्यों कर रहा हूँ। ४५ साल का बच्चा घर छोड़ कर दूर यात्रा पर जा रहा था। मामा जी, आदतानुसार, अपनी चैकलिस्ट से आख़िरी तहकीकात करने लगे। सामान तो सब ले लिया है? टैक्सी के और एयरपोर्ट टैक्स के रुपये तो ऊपर रख लिए हैं? बाकी के रुपये डालर में बदलना न भूलूँ आदि आदि सलाह चली रही थी। अचानक मेरे मुँह से यह बात निकल गयी कि बाकी रुपये तो मैं माँई जी के पास छोड़े जा रहा हूँ। चलती बार जब झुक कर माँई जी के पैर छूने लगा तो उन्होंने धीरे से मुझ से कहा कि अरे तुमने तो रुपये की बात मामा जी से बता दी। यह बात मेरे ह्रदय में एक तीर से भी गहरी पैठ गई। वहाँ से बिना पीछे मुड़े जो भागा तो फिर कनाडा पहुँच कर ही साँस में साँस आई।
वह रुपये क्या हुऐ? माँई जी उन्हें अपने पास रख सकीं या नहीं यह मुझे बताने के लिए वह अधिक जीवित नहीं रहीं। आज न मामा जी हैं न माँई जी हैं और यह कोई ऐसी बड़ी ऐतिहासिक घटना भी नहीं है। मुझे इसकी याद दिलाने या उलाहना देने वाला भी अब कोई नहीं है। पर उनके वह शब्द और उनका चेहरा मन में बार बार आते रहते हैं। पाठक, अगर आप अभी भी मेरे साथ हैं तो इतना बताता चलूँ कि मैं इस समय भी आँख साफ़ करने के लिए जेब में अपना रुमाल खोज रहा हूँ और यह समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि ऐसी यादों से कैसे छुटकारा पाऊँगा। आप ही यदि कोई उपाय जानते हों तो मुझे पत्र लिख भेजें।
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