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ग़ालिब कह ही चुके हैं कि कुछ तो बात है कि चुप हूँ व़रना क्या बात कर नहीं आती। कालिज में हमारा ग्रुप बातचीत में माहिर था। बहस मुबाहिसा हद से ज़्यादा होता था। जब तक रोज़ दो तीन घन्टे दुनिया की हर बात पर लड़ाई होने की हद तक बहस न हो जाये किसी का खाना हज़्म नहीं हो सकता था। लोग सब बड़े पढ़ाकू टाइप थे और कुछ तो किताबें ले कर ही सोते भी थे। आपका लेखक भी कुछ इसी टाइप का था। मेरी खाट पर इतनी किताबें जमा हो जातीं थीं कि सोने की भी जगह नहीं रहती थी। कुछ दोस्त कालिज की वाद विवाद टीम के मेम्बर थे और यूनिर्वसिटी चैम्पियन भी थे। बडे़ बडे़ लेखकों की बातों और किताबों का ज़िक्र इनकी ज़ुबान पर रहता था। हमारे एक मित्र की मैमोरी इतनी अच्छी थी जिस किताब को एक बार पढ़ लेते थे उसको दुबारा देखने की ज़रुरत नहीं होती थी। इनसे बात करके जीतना बड़ा मुशकिल होता था। दुनिया का हर लेखक जिसकी किसी विषय पर ज़रुरत होती जैसे इनकी जेब में ही बैठा रहता था। हमारे इंगलैंड रिर्टन प्रोफ़ेसर तक इनसे पंगा नहीं लेते थे। इनके हाथ में कम से कम चार पाँच मोटी मोटी किताबें हर समय हर दिन रहती थीं। अब यह एक विश्वविख्यात प्रोफ़ेसर हैं और सारी दुनिया में व्याख्यान देने के लिये बुलाये जाते हैं।
एक दिन आये और कहने लगे कि अब कुछ कहने बोलने की बात नहीं है और चुप ही रहना अच्छा है। मैं तो जैसे आसमान से गिर कर खजूर में अटका। जो आदमी हमेशा बढ़चढ़ कर बोलता ही रहा है और कभी चुप नहीं रहा है अब कैसे न बोलने की बात कर कर रहा है। पूछने पर कहने लगे कि अब जब कोई सुन ही नहीं रहा है तो कुछ कहने से क्या फ़ायदा है। फिर कहने लगे कि जो कुछ कहने की बात मन में आये उसे लिख देना चाहिये।
उसके बाद से यह मित्र ५० से ऊपर किताबें लिख चुके हैं। हर किताब की एक प्रति मुझे देना नहीं भूलते है। मेरे पुस्तकालय में एक शैल्फ़ इन्ही की किताबों से भर गया है।
मुझे भी लगता है कि कहने से कुछ नहीं होता जब तक कोई ध्यान दे कर सुन न रहा हो और समझने की मानसिक स्थिति में न हो। हमारे कान हमेशा खुले रहते हैं और तरह तरह की आवाज़ें चाहे अनचाहे कान में घुसती ही रहती हैं। वह एक तरफ़ से आ कर दूसरी तरफ़ से निकल जाती हैं और हमें ख़बर तक नहीं होती। हर पत्नी को अकसर यह शिकायत रहती है कि वह जाहे कुछ भी कहती रहे पर वह तो सुनते ही नहीं हैं। हम सब भी कुछ इसी तरह के हैं। मतलब की ही बात सुनते हैं। और फिर सबके मतलब इतने अलग अलग हैं कि किसी की बात किसी के मतलब की नहीं होती।
प्रसिद्ध दार्शनिक श्री कृष्णामूर्ती ने कहीं कहा कि जब शब्द हमारे मुँह से निकल जाता है तो पहले तो हवा में रहता है और फिर अगर कोई कान मिल जाये तो घुसने की कोशिश करता है। यह तो आप जानते ही हैं कि कमान से निकला तीर और मुँह से निकला शब्द वापस नहीं आता है। अब अगर शब्द को कान मिल भी गया, तो भी हो सकता है कि वह दिमाग़ जहाँ इसका मतलब निकलना है किसी और तरफ़ व्यस्त हो और उसे इन शब्दों का मतलब निकालने की फ़ुरसत न हो और कह दे कि फिर कभी आना। माना कि सब कुछ ठीक है और कान ने मतलब निकालने की ठान भी ली पर वह ठीक मतलब, या जिस अर्थ में बात कही गयी थी, न निकाल पाया तो कहेगा कि आपने क्या कहा मैं समझा नहीं। या फिर आप ही कहेंगे कि आप समझे नहीं मेरा आशय क्या था। अब अगर आपसे कहा जाये कि अपनी बात ज़रा दोहरा दें तो हो सकता आप ही भूल गये हों कि आपने अभी अभी कहा कया था। बहुत से या ज़्यादातर लोग कहते नहीं हैं बात बस यों ही मुँह से निकल जाती है। कभी लोगों के पल्ले पड़ जाती है कभी नहीं। इसका लोगों को कोई ख़ास मलाल नहीं होता है। ऊनका मतलब तो बस बात कहने का होता है चाहे कोई सुने न सुने, समझे न समझे। सुनने वाले की भी समस्या है, उसे समझ में नहीं आता है कि किस की सुने किस की न सुने। ज़्यातर बातें बेमतलब ही होती हैं और उन पर कोई समझदार आदमी ध्यान नहीं देता है।
अब चलिये, सब ठीक ठाक है, बात भी ठीक है और श्रोता का दिमाग़ भी खुला हुआ है और उसने आपकी बात सुन ली और समझ भी ली और अपनी गरदन भी हिला दी। अब सवाल यह उठता है वह बात दिमाग़ में बैठेगी भी कि नहीं? मुझे सहगल साहब के और मुकेश के ५०-६० साल पहले के गाने मय धुन के याद हैं। आज का गाना सुनने के एक मिनट के बाद ही याद नहीं रहता। आकसर माँ बाप की बच्चों से शिकायत रहती है कि बात एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देते हैं। अब मैं ही सोचता हूँ कि उन लाखों करोड़ों शब्दों में जो मेरे कानों में गये होंगे, कितने मुझे याद हैं। मैं उन बातों पर ध्यान दौड़ा रहा हूँ जो मेरे बड़ों ने, मेरे गुरुजानों ने मेरे भले के लिये मुझसे कही होंगी और उम्मीद रखी होगी कि मैं वह बातें गाँठ में बांध लूंगा। सच बात यह है कि गाँठ या गठरी में बहुत थोड़ा सा माल है। इस गठरी में तो माल इतना कम है कि इसमें चोर भी नहीं लगता। वैसे मैं अपने गुरु जनों के आगे यह स्वीकार नहीं करुँगा। यह बात तो मैने पाठक यह सोच कर आपके कान में डाल दी है कि आप तो यह बात जल्दी ही भूल जायेंगे।
मैं एम ए के दूसरे साल में था। पारिवारिक द्रष्टिकोण से यह साल अच्छा न था। काम में, टयूशन आदि के चक्कर में पढ़ाई ठीक नहीं हुई और मुझे लगने लगा कि मैं फ़ेल हो जाऊँगा। मैने ड्राप करने का फ़ैसला कर लिया और मस्त घूमने लगा। एक दिन कहीं जा रहा था तो रास्ते में मेरे फ़िलासफ़ी के गुरु जी मिल गये। बोले कि क्यों जी कहाँ घूम रहे हो पढ़ाई कैसी चल रही है? मैंने अपनी सब कठिनाईयों की कहानी उन्हें समझा दी। वह कितना समझे कितना नहीं यह मैं नहीं जानता। पर उन्होंने अपने बड़े ही भोले अन्दाज़ में जो बात कही थी वह आज भी गाँठ में कस कर बँधी है। उन्होंने कहा था कि कोई बात नहीं अगले साल ही इम्तहान दे लेना पर देख लेना कि अगले साल फिर इसी तरह की बातें न हो जायें। यह गारंटी कौन कर सकता था। जो कुछ करना है वह आज की अभी की परिस्थियों में ही करना है। कल की बात कौन जानता है। इस बात ने मेरा जीवन बदल दिया। मैं बीच रास्ते से ही लौट कर घर आया और तैयारी में जुट गया। परीक्षा भी पास हो गयी, साल भी बच गया। मैं आज भी कहता हूँ बलिहारी गुरु आपकी एम ए दियो कराय। आपने गुरु काली कमली वाले की भी सीख याद है कि माँगो मत बस देते रहो।
अपने डाक्टर की बात भी याद है कि आपने शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक स्वास्थ के लिये बस आगे बढ़े चलो, चले चलो। गुरुदेव भी कह गये हैं एकला चलो रे।
मेरी बात करने की आदत अभी भी गयी नहीं है? कुछ बात करने का अन्दाज़ इस तरह का हो गया है कि लोग बात करने, सलाह करने आ ही जाते हैं। कुछ लोगों को यह भ्रम है कि मुझ में कुछ गुरुओं की सी बात है। कभी कभी कोई कोई मुझे मेरी ही कही बातें याद दिलाने की कोशिश भी करता है। मेरी बरसों पहले कही हुई कोई बात दोहराता है। आप को बताने की आवशयकता नहीं है कि मैं वह बातें कभी का भूल चुका हूँ।
पाठक आप तो देख ही रहे हैं कि बात करने से कोई बहुत लाभ नहीं है, सुनने समझने वाले और फ़ुरसत वाले कम ही हैं, और वह आपसे आ कर टकरा जाये यह भी ज़रुरी नहीं है। ख़ुद दिल से दिल की बात कही और सो गये वाली बात ही ठीक हे। |