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घर में रहते थे तो जो बनता था वह खाते थे। पता ही नहीं होता था कि क्या बन रहा है। थाली में जो आ गया वह ही खाना होता था। ना नुकुर करने की कोई गुंजाइश नहीं होती थी। घर में शाकाहारी खाना बनता था। घर के मर्द तो जो चाहे खायें पर घर की स्त्रियाँ तो शाकाहारी ही थीं। कभी कभी वह मर्दों का मन रखने के लिये माँसाहारी खाना भी बना देती थीं। मेरी माँ ने कभी मीट चखा तक नहीं पर वह बहुत ही अच्छी डिशेज़ बनाती थीं और उनकी पहचान दूर तक थी। मैं भी खाना बना लेता हूँ पर कई बार बनाते बनाते चखना पड़ता है। बड़ा आशचर्य होता है कि वह बिना कभी खाये हुए इतना अच्छा कैसे बनातीं थीं। ख़ैर पाठक मैं ज़रा भटक रहा हूँ। कहने की बात यह है हम जानते थे कि हमारे घर का खाना शाकाहारी है। यह भी जानते थे कि थाली में दाल, सब्ज़ी, रोटी, चावल, दही, अचार और चटनी तो होने ही हैं। दिन में रोटी ही बनती थी और शाम को पूरी या पराठे बनते थे। शाम को रोटी खाने का ख्याल हमारे बड़ों को कभी ख्वाब मे़ भी नहीं आया। डाइटिंग का नाम भी कोई नहीं जानता था और इसके मतलब लोग यह समझते कि सेहत के लिए और ज़्यादा खाना है और घी मक्खन की मात्रा बढ़ानी है। जब मेरे पिता जी की उम्र हो गयी तो हम सब उन्हें पूरी पराठे आदि कम खाने की सलाह देने लगे पर यह बात उन्हें कभी गले नहीं उतरी। वह एक बार मेरे यहाँ कनाडा में आये तो मैंने और मेरी पत्नी ने उनके स्वास्थ की द्रष्टि से पूरी पराठे बिलकुल ही ग़ायब कर दिये। हमारे पिता जी ने कुछ मुँह से तो नहीं कहा पर वह यह समझते थे कि मैंने उन्हें जेल में बन्द कर दिया है और कैदियों जैसा रुखा सूखा खाना उन्हें दे रहा हूँ। मैं दूर देश में उनकी तबियत ठीक रखने के लिए यह कर रहा हूँ यह उन्हें महसूस नही हुआ। मैं समझ तो गया पर ढीट बना सादा और सेहतमन्द खाना ही बनाता या बनवाता रहा। कभी कभी जब मैं उन्हें बाहर खाना खिलाने ले जाता तो उनकी बन आती। माता जी के शुद्ध शकाहारी होने के कारण हम हिन्दुस्तानी रेस्त्राँ में ही जाते थे और वहाँ मैं उन्हें उनका मन पसन्द खाना खाने से नहीं रोक सकता था। पाठक, अब आपको बताना न होगा कि मेज़ पराठों और पूरियों से भर जाती। अक्सर शाम की चाय के साथ भारी नाशता भी हो जाता था। पर बाबू जी चार छह समोसे और नमकीन दालमोठ को खाने में शुमार नहीं करते थे। रात का खाना तो वही होता जो होना था। बाबू जी का मन कनाडा में ज़्यादा नहीं लगा। मेरी हरचन्द कोशिश के बाद भी पराठे उन्हें खींच कर बरेली ले ही गये और वहाँ वह अपना जाना पहचाना खाना खाते हुए इस संसार से बिना किसी बीमारी हारी के विदा हुए।
मेरे पैर में कुछ चक्कर लगा कि मैं घर से बाहर ही रहा और बहुत घूमा। इतना घूमा कि तंग आ गया। १५-२० दिन के टूर तो मामूली बात थी। एक समय तो हर हफ़्ते में चार दिन बाहर रहता था। मेरा अन्दाज़ा है कि मैंने जीवन में ५० लाख मील से ज़्यादा का सफ़र किया है। पैदल से ले कर हवाई जहाज़ तक कोई सवारी नहीं है जिस पर मैं न बैठा हूँ। गाँव से ले कर लन्दन पेरिस सब देखे हैं। भारत का शायद ही कोई बड़ा या छोटा शहर जहाँ मैं गया नहीं हूँ। दुनिया भर के सभी बड़े शहर देखे है और ख़ूब देखे हैं। बाहर रहा तो खाना भी बाहर ही खाया। अगर कभी ग़लती से अपने शहर में भी रहा तो खाना बाहर ही हुआ। बिज़नेस के मामले ही ऐसे होते हैं। मार्केटिंग और पब्लिक से काम होने के चक्कर में बाहर ही खाना पड़ता था। मेरा यह भी अन्दाज़ा है कि मैंने पाँच छह हाज़ार से ज़्यादा रातें होटलों में काटीं हैं। पाठक अब आप पूछेँगे कि इसका खाने से क्या मतलब है?
जनाब बात यह है कि मैं तकदीर में घर का खाना लिखवा कर ही नहीं लाया। यह मुझे आसानी से नसीब नहीं होता। मुझ से भारत में अकसर पूँछा जाता है कि मैं यहाँ क्या खाता हूँ। उनके सवाल का मतलब होता है कि शायद उनकी तरह दाल रोटी ही खाता हूँ। जब पहली बार यह सवाल दाग़ा गया तो मुझे यह सोचना पड़ा कि मैं क्या खाता हूँ। जबाब तो यह है कि मैं ख़ुद भी नहीं जानता कि क्या खाता हूँ। जहाँ जो मिल गया वही खा लिया। नैपाल के जंगलों में साग रोटी मिल गई तो बड़ी किस्मत खुली यह जाना। जैसलमेर में पता चला कि पूरी सब्ज़ी वहाँ का चलन नहीं तो पूरी से बरफ़ी चली। रोटी प्याज़ या रोटी चटनी भी भूख में बड़ी नेमतें लगी हैं। अलमोड़ा से पिथौरागढ़ की सढ़क पर दनिया के पराठे जाने कितनी बार खाये हैं. मैं उलटा सीधा खाना खाने का इतना आदी हो चुका हूँ कि समोसे को पूरी और आलू समझ कर खाता हूँ। तीन समोसे और पानी से ख़ूब काम चल जाता है। फ़ाइव स्टार में बेमन से खाना न जाने कितनी बार खाया है। इतना खाया है कि अब सादी दाल रोटी र्स्वग से उतरा पकवान लगता है।
हर जगह हर किसी की यही बात है। हम किस खाने को अपना समझते हैं किसको अपनी आत्मा की ख़ुराक समझते हैं बहुत बड़ी मिस्ट्री है। कुछ सामाजिक वातावरण भी यह निशचित करता है कि नाशते, दोपहर और रात के खाने में क्या होना चाहिये। खाने का समय भी देश देश में अलग है। अमरीका और भारत में लोग काम से लौट कर शाम को जल्दी खा लेते है. मध्य सागर वाले देशों में रात का खाना १०-११ बजे शुरु होता है। दिन का खाना बड़ा खाना होता है और रात का टूँग टाँग। दिन का खाना खा कर एक दो घन्टे सोने की भी प्रथा है। अमरीका में ऐसा करना काम चोरी समझी जायेगी। इगंलैंड में दोपहर की चाय का बहुत ही चलन है और इसका ताम झाम भी ख़ूब है। आफ़्टरनून टी के खीरे के सैन्डविच भी और किसी समय नहीं खाये जाते।
जब मेरे बाबूजी बउआ कनाडा में थे तो मैंने सोचा उन्हें यहाँ की रेल का भी सफ़र करा दूँ। उन दोनों को रेल के सफ़र का बहुत शौक था। मेरी माता जी को तो ट्रेन में बैठ कर और स्टेशन का खाना बहुत प्रिय था।उन्हें बड़ा चाव हुआ कि यह भी देखें कि कनाडा का रेल का सफ़र कैसा होगा। पर यहाँ का ट्रेन का सफ़र भारत जैसा नहीं है। बिना टिकट वाला प्लेटफ़ार्म पर नहीं जा सकता हौ। इससे भीड़ की घमासान और धक्का मुक्की का कोई पता नहीं है। सब कुछ बहुत कायदे और शान्ती से होता है। आपके सर पर कोई सामान नही फेंकता है और न ही कोई अपनी ग्रहस्थी ले कर चलता है। बहुत हुआ तो एक छोटा सा बैग हाथ में ले लिया। और खाना ट्रेन ही में मिल जाता है प्लेटफ़ार्म पर वैन्डरों की पुकारों का सर्वथा अभाव है। साधारण वर्ग में सैन्डविच मोल मिल जाते हैं या लोग कुछ हल्का फुल्का अपने साथ ले आते और सकुचाते सकुचाते चुपचाप खा लेते हैं। पहले दर्जे में बाकायदा हवाई जहाज़ की तरह की सर्विस होती है। मैं उस समय कनाडा रेल में बड़ा अफ़सर था और मुझे पहले क्लास का पास मिलता था। अब तक मेरे माता पिता दोनों शाकाहारी हो चुके थे इसलिये मेंने उनके लिये ख़ास तौर शाकाहारी खाना आर्डर किया। ऐसी डिमान्ड बहुत कम होती थी। कुछ मेरा मामला था इसलिये इस बात पर ख़ास प्रबन्ध किया गया। जब खाने की द्रे आई तो उसमें मोटा मोटा कटा हुआ सलाद, कुछ फल और चीज़ थे। हमारा बेस्वाद पनीर और चीज़ है पर यहाँ का चीज. तो कुछ और ही बात होती है। साधारण भारतीय के समझ में आने वाली बात नहीं है। ले दे कर अँगूर और ब्रेड रोल ही उन्हें खाने की चीज़ लगे। टोरान्टो पहुँचते ही मैं उनको ले कर भारतीय भोजन के लिऐ ले गया। अब ट्रेन स्टाफ़ के कम से कम ४ लोग बार बार यह पूछने आये कि खाना कैसा हुआ। मैंने उनका मन रखने के लिये कह दिया कि सब बहुत अच्छा है। उन्हें मैं कैसे बताता कि एसा खाना हमारी भैंस भी नहीं खायेगी।
मेरे कई भाई पिछले ४० वर्षों से अमरीका में रहते हैं और इन सबकी पत्नियाँ भारत की हैं। इनके घरों में हमारा स्वाभिक खाना बनता है। जान पहचान वाले आते हैं तो वही पूरी सब्ज़ी या कभी कभी चिकन। घर के लोग जमा हुऐ तो कढ़ी चावल रायता। हमारे भतीजे भतीजी अमरीका में पले बढ़े हैं। घरों में वही दाल रोटी खा कर बढ़े हैं। बाहर के खाने की बात और है। जब बच्चे बड़े हुए और अमरीका के त्योहारों से परिचित हुए तो वह घर में भी वही सब देखना चाहते थे। शुरु शुरु में भाबियों ने मिला जुला खाना बनाने की कोशिश की जिससे सब का काम चल जाये। एक बड़ी सी टर्की बनाना इनके ध्यान में आया ही नहीं। बच्चे इस मिक्सड मामले से सन्तुष्ट नहीं होने वाले थे। उन्हें तो टिपिकल थैंक्स गिविंग और क्रिसमस वाली टेबल की आकंशा यी जिस पर बड़ी सी टर्की, अमरीकान स्टाइल की तरकारियाँ और अमरीकन मिठाईयां हों। टर्की के साथ क्रैनबेरी सास भी ज़रुरी है। अब तो हम भी इसके आदी हो गये हैं। अपने देश के लोग तो यह सीन देख कर मेज़ छोड़ कर भाग जायेगे। मगर हमारी अमरीकन बार्न कनफ़्यूज़ड पीढ़ी इसको अपना ही खाना समझती हैङ भाभियों को यह सब सीखना और करना पडं। यह बच्चे भारतीया खाना खा तो लेते हैं मगर और दुनिया भर के खाने इनके लिये अधिक स्वाभाविक हैं।
किसी ने एक पठान को साबुन खाते देख कर पूछा था कि पठान क्या खाता है. पठान ने कहा के वह अपना पैसा खाता है। मैं भी ज़्यादातर खाने यही समझ कर खा लेता हूँ कि जब पैसे देने हैं तो फिर खा ही लूँ। वैसे जब भी मौका मिलता है दाल रोटी की तलाश करता हूँ। कनाडा में भारतिय भोजन की अब कमी नहीं है। माँट्रियल में ही ७५ से ऊपर भारतीय भोजानालय हैं। टोरान्टो और वैनकू्वर में तो इनकी गिनती ही नहीं है। दुनिया का शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहाँ अपना खाना न मिलता हो। इंगलैंड में हर गाँव में करी हाउस खुल गये हैं। चिकन टिक्का मसाला यहाँ की नेशनल डिश मानी जाती है. हर खाने की दुकान में मसाले, समोसे और बने बनाये पैक्ड खाने मिलते हैं। मैं अभी हाल में ही जान कर हैरान हो गया कि चीन तक में भारतीय खाना पहुँच गया है। शंघाई में ही ९ भारतीय भोजनालय है। पाठक अब आप कहेंगे कि जब अपना खाना विदेश की गली गली में मिल रहा है तो फिर मेरी क्या शिकायत हो सकती है? अब बस यही तो अजीब बात है कि भारतीय रेस्ट्राँ से भारतीय खाने का दूर दूर तक कोई सम्बन्ध नहीं है। दुनिया भर में हिन्दुस्तानी भोजनालयों की तीन किस्में हैं। पंजाबी तन्दूरी या लाहौरी, बंगलादेशी करी हाउस और कंही कंही दोसा हाउस। इस खाने से आम हिन्दुस्तानी का कोई दूर दूर का रिशता नहीं है। ऐसा खाना हमारे घरों में कभी नहीं बनता है। अगर यह खाना ह्फ्ते में दो तीन बार भी खा लें तो यमराज का काम बहुत आसान हो जायेगा। भारत एक बड़ा देश है जहाँ हर १०० मील पर भाषा और खाना बदल जाता है। हमारे लोग किताब पढ़ कर खाना बनाना नहीं सीखते वरना घर में माँ दादी नानी से सीखते है। हर घर का खाना अलग है। हर बहन माँ पत्नी का मसाला अलग है हाथ अलग है तरीका अलग है। एक ही मोहल्ले में पचास तरह आलू बनते हैं। अब यह भी देखिये कि दुनिया भर में फैले अपने रेस्त्राँ एक सा ही खाना बनाते हैं। मैं तो इसे अपने खाने के तौर पर स्वीकार करने से रहा।
पाठक अगर आप अब तक पूरी तरह चक्कर में आ गये हैं या अँग्रेज़ी में कनफ़्यूज़ड हो गये तो मुझसे शिकायत करने से कोई फ़यदा नहीं। मैं तो ख़ुद ही चक्कर में हूँ तो आप की क्या मदद कर सकता हूँ। बस यह ही कह सकता कि मुझे कुछ पता नहीं है के मैं क्या खाता हूँ। पठान की तरह साबुन को बरफ़ी समझ कर खा लेता हूँ और अपने पैसे की कीमत व़सूल होने की उम्मीद करता हूँ।
पाठक आप मेरे चक्कर से निकलें और अपनी परम प्रिय चीज़ें खा पी कर लम्बी तानें। |