o यह भी क्या कोई लिखने की बात है।
o आत्म निवेदन
o प्रतीक्षा
o सूरज है सिन्दूरी
o पिया और पपीहा
o उलझन
o उदासीनता
o हरीश गुरु
o आदि गुरु
o मेरा संगीत का सफ़र
o किताबें ही किताबें
o छपने छपाने की बात
o मैं बोलता क्या हूँ?
o सठिया जाने का मामला
o जादूगर गुरु
o मदारी दरवाज़े की बात
o कुछ कहने न कहने की बातें ।
o समझता तो हूँ पर कहता नहीं हूँ
o मै खाता क्या हूँ
Home | Contact
लेख कविताऐं



मदारी दरवाज़े की बात

मदारी दरवाज़े का मदारियों से क्या सम्बन्ध यह मैं नहीं जानता। मैं इस गली में बहुत दिन रहा हूँ पर कोई मदारी कभी देखने में नहीं आया। बन्दरों का तामाशा दिखाने वाला भी कभी कबार आया हो तो आया हो।

बरेली के बड़े बज़ार के बीचो बीच है यह गली। यह वही बज़ार है जहाँ कभी कोई झुमका गिर गया था। आशा भोंसले ने बड़े सुन्दर तरीके से सारी दुनिया में यह ढिढोंरा पीट दिया कि किसी का झुमका बरेली के बज़ार में गिरा रे। जब यह शोर मचा तो मैं वहीं रहता था और कोशिश भी मैने की यह झुमका शायद मेरी ही नज़र में आ जाये। पाठक मुझे तो यह झुमका नहीं मिला पर अगर आप में से किसी के हाथ में आ गया हो तो कम से कम मुझे बता तो ज़रुर ही दीजियेगा।

किले से शहामत गंज तक जाने वाली सीधी सड़क का नाम ही बड़ा बाज़ार है और इसके बीच मे दर्ज़ी चौक और सीताराम के कूचे के बीच में यह गली है। यह एक समय इस इलाके का मशहूर बाज़ार था और बड़ी रौनक वाला बाज़ार था। दूर दूर से लोग यहाँ सामान ख़रीदने आते थे।

मैं तो अपने बचपन में इस गली को ही बरेली का सबसे अच्छा और आलीशान इलाका समझता था। पहली वजह तो यही थी मैं यहाँ रहता था। दूसरी यह कि बरेली के जाने माने वकील नाग साहब यहाँ रहते थे। अब जाने माने कितने भी रहे हों पर थे तो मेरे मामा ही। मैं तो उनको एक विशिष्ट वकील मानता था। वैसे वह शहर में अपने ठसके के लिये और गुस्से के लिये भी जाने जाते थे। ख़ैर यहाँ अपने घर की पोल खोलने का कोई इरादा नहीं है और अगर आप में से किसी ने यह कोशिश की तो फिर झगड़े के लिए तैयार रहियेगा।

यह गली बड़े रईस कपड़ा व्यापारियों की थी। बड़े बज़ार के सारे बजाज यहीं रहते थे। इनमें बड़े दानी, बड़े गुस्सैल, बड़े ख़रदिमाग़ और बड़े रईस, सभी तरह के लोग थे। इस गली के नुक्कड. पर बरेली की मशहूर मिठाईयों, कचौड़ी, चाटवालों और दूध-रबड़ी वालों की दुकानें थीं। दूर दूर से लोग यहाँ इस वजह से आते थे। यह सब पढ़ कर आप कहीं उधर की राह मत पकड़ लीजिएगा। मैं तो ६० साल पहले की बात कर रहा हूँ। पुराने लोगों का दस्तूर ही ऐसा है कि उन्हें पुराने ज़माने की यादें ख़ूब रहती हैं और वह उसको सुनहरा दौर समझते हैं। वैसे से सच तो यही है कि मेरे बचपन के ज़माने में इस गली का जगमगाता हुआ दौर थ। तब तक इस गली में बिजली नहीं आई थी पर रोशनी के सब इन्तज़ाम थे। मुनिस्पैलटी का आदमी आ कर मिट्टी के तेल के लैम्प जगह जगह जला जाता था। सड़कें कच्ची थीं पर भिशती रोज़ आ कर छिड़काव करता था। बड़े ठसके के लोग यहाँ रहते जिनके उजले कपड़ों पर धूल लगना एक सकैन्डल से कम नहीं था। मेरे मामा भी बड़े सलीके से कपड़े पहनने वाले लोगों में थे। उनकी जेब में तीन रुमाल रहते थे। एक मुँह पोंछने के लिए, दूसरा जूते पोंछने के लिये और तीसरा जिस कुर्सी पर बैठते थे उसके लिये। तो आप अब बात तो समझ ही गये होंगे।

अब इस गली की हालत कुछ और है। रईस लोग अब गलियों में नही रहते हैं। सबने अपनी कोठियाँ बाहर खुली जगहों में बन वाली हैं। गली में अब हर मकान में कपड़े की और ज़री के काम की दुकानें खुल गई हैं। किसी ज़माने में यह गली बड़ी ख़ास समझी जाती थी और यहाँ हर किसी की आने की हिम्मत नहीं होती थी। अब तो यह बड़े बज़ार का ही हिस्सा हो गया और जो भी चाहे मुँह उठाए चला आता है।

अपनी पुरानी सुनेहरी यादों के कारण मैं जब भी बरेली जाता हूँ तो यहाँ भी जाता हूँ। जान पहचान के गिने चुने लोग ही रह गये। जब तक यह हैं मै तो जाता ही रहूँगा।

पाठक, वैसे तो बरेली पर्यटकों के जाने की जगह नहीं है और मदारी दरवाज़ा तो कतई नहीं है। पर कपड़ा और साड़ियाँ ख़रीदने वालों के लिये पराठे वाली गली के बाद यही सबसे अच्छा इलाका है। न तो अब दिल्ली की पराठे वाली गली में असली पराठे ही मिलते हैं और न मदारी दरवाज़े वाले पन्ना कचौड़ी वाले की कचौड़ियाँ। लाला मंगामल की दुकान तो कब की बन्द हो गई। हज़ारी दूध वाला भी नहीं है। शंकर चाट वाला और ज्वाला परशाद हलवाई भी नहीं हैं। हिन्दुस्तान में दूर दूर तक जा कर बरातों का खाना बनाने वाला दरोग़ा भी अब नहीं रहा। कभी यहाँ बहुत छीपी भी रहते और धोतियों की छपाई का भी बड़ा काम होता थ। अब तो हाथ की छपाई का काम शायद ही कोई करता है। छपाई के ठप्पे अब कलैक्टर आइटम बन गये हैं और देश विदेश में रईसों के ड्राइंग रुमस में सजे हैं।

वैसे पाठक, मदारी दरवाज़े में न तो कोई मदारी है, न ही कोई दरवाज़ा है और न ही वह पहली जैसी शान है। मैं चाहे वहाँ आता जाता रहूँ पर आपको इधर आने की कोई ख़ास वजह नहीं है। अपना बटुआ दे कर अपने घर की स्त्रियों को अवशय आने दीजियेगा, ताकि जो लोग रह गये हैं और धन्धा कर रहे हैं उनकी रोज़ी रोटी चलती रहे।

मेरे ध्येय इस साइट पर आपका स्वागत करना है। अपनी बात आपको कभी कभी बतानी है।

ख़ास ध्येय हिन्दी और हिन्दी साइटों से आपका परिचय कराना है और मदारी दरवाज़े से एक मदारी की तरह आपका प्रवेश इस अजीबो ग़रीब दुनिया में कराना है।

पाठक, आते जाते रहियेगा और कभी कभी लानत मलामत भी करने की तकलीफ़ कर लिया करियेगा।



Powered by Sri Technocrat | Best viewed in 1024 X 768