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जब लिखना शुरु किया तो पहला प्रशन् यह हुआ कि किस भाषा में लिखा जाये। अँग्रेज़ी में एम ए किया है। ४८ साल से अँग्रेज़ी लिखते बोलते हैं या फिर फ्रैंच में काम करते हैं। ईलेन ने भी कहा कि अँगरेज़ी में ही लिखो जिससे यहाँ सब पढ़ सकें और तुम्हारा लिखा हुआ छप भी सके। पर मैंने हिन्दी में ही लिखना निशचय किया। यह एक लंगड़े की मैराथान दौड़ में भाग लेने जैसी बात है। मुझे हिन्दी का क्या पता है। बस हाई स्कूल तक ही तो पढ़ी है। बारह खड़ी तक तो सुना नहीं सकते और व्याकरण के नाम से तो घिघ्गी बँध जायेगी। कठिन शब्दों को लिखने की आदत नहीं है और फिर सही तरीके से लिखना भी नहीं आता है। हिन्दी की टाइपिंग तो कभी सीखी ही नहीं थी। तो क्या अहमकपन सूझा कि हिन्दी में लिखने का इरादा किया?
हिन्दी को मैं अपनी मातृभाषा कहता हूँ और यह मेरी माँ ने मुझे बचपन में सिखाई थी। मुझे लगता भी है कि सहजता से इसे बोल सकता हूँ और हिन्दुस्तान के आम आदमी से आसानी से बात कर सकता हूँ। एक पढ़े लिखे हिन्दी दाँ की भाषा कैसी होती है यह जानता तो हूँ पर लिख नहीं सकता। शुद्ध हिन्दी वाले संस्कृत से हिन्दी की उत्तपत्ति मानते हैं और उसे अन्य भाषा स्पर्ष से बचाना चाहते हैं। हमारी बोलचाल की भाषा में उर्दू के शब्द आते रहते हैं और उनमें ऊपर नीचे बिन्दी बड़ी लगती है। मदन मोहन मालविया जी ने यह सवाल उठाया था कि हिन्दी में बिन्दी क्यों। हिन्दी में तो बिन्दी कम ही लगती है और जिनको बिन्दी लगाने में शर्म लगती है वह अपनी हिन्दी में से उर्दू के अलफ़ाज़ निकाल बाहर करें। कहना आसान है पर करना मुशकिल है। अवधी, ब्रजभाषा, भोजपुरी, उर्दू, अँग्रेज़ी और अन्य भारतीय भाषाऐं मिला कर हमारी बोलने वाली हिन्दी बनती है। भारतवर्ष के आज़ाद होने के बाद से ही डाक्टर रघुबीर हिन्दी की आधुनिक शब्दावली बनाने में लगे और आधुनिक सभ्यता और तकनीकी को समर्थ करने के लिए ३०,००० से ऊपर बड़े बड़े भयंकर शब्द बनाये। यह आज भी लोगों की ज़ुबान पर नहीं चढ़े हैं। उनका बनाया शब्दकोश कहीं पड़ा धूल खा रहा होगा। यह तकनीकी युग है और इसमें नयी सम्भावनाऐं और अवशयकताऐं बहुत द्रुत गति से परवान चढ़ती हैं। हर वर्ष अँग्रेज़ी भाषा २०-२५,००० नये शब्द जोड़ लेती है। और भाषाऐं इतना नहीं कर पातीं हैं और दिन पर दिन पिछड़ती जाती हैं। अँग्रेज़ी आज काम की विशव भाषाबन चुकी है। हिन्दी में भी यही बात है। यह भारत की भी काम की भाषा नहीं बन पाई है। इसकी संस्कृत निष्ठ शुद्धता बनाये रखना बहुत कठिन होगा। कूप मंडूक बनने से अच्छा है कि नदी की धार में सुख से बहते रहें। नये मौसम के हिसाब से कपड़े बदलते रहें।
हिन्दी के एक बड़े कवि ने कहा है कि जिस तरह मैं बोलता हूँ उस तरह तू लिख, और उसके बाद भी मुझसे बड़ा तू दिख। बात तो सोचने की यह है कि कहना क्या है और किसके लिए कहना है। भैंस के आगे बीन बजाने से क्या फ़यदा है? तो मैं उसी भाषा में लिखना और बोलना चाहता हूँ जो मेरे लोग बोलते हैं और आसानी से समझते हैं।
मैं रामपुर बरेली क्षेत्र की पैदावार हूँ और मेरी भाषा खड़ी बोली और उर्दू का मिश्रण है। मेरे लिखने की रवानी इसी से आती है। प्रवाह भी इसी से आता है। शुद्ध उर्दू में भी मुझे महारत हासिल नहीं है। उर्दू की अलग पहचान बनाने के लिए पाकिस्तान की भाषा में अरबी और फ़ारसी के बड़े अलफ़ाज़ डाले गये और इसे बहुत मुशकिल बनाया गया पर भारत की उर्दू इस से अलग खड़ी है। हिन्दी फिल्मों के ज़्यादातर संवाद लेखक और गीतकार मुसलमान रहे हैं और उन्होंने जिस उर्दू या हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग किया है वह पूरे भारत को समझ में आती है। साहिर, शैलेन्द्र, शकील बदाँयूनी, गुलज़ार, कवि प्रदीप और कैफी आज़मी ने जो भाषा सारे हिन्दुस्तान में गुंजायमान कर दी है वह हमारी आज की भाषा है। सहिर ने क्या ख़ूब हिन्दी के भजन लिखे हैं और पंजाबी होते हए भी गुलज़ार साहब ने क्या उर्दू लिखी है। हिन्दी में आज लिखा जाता है-टेंन्शन नहीं लेने का, ब्रिटेनिया बिस्कुट खाने का। अँग्रेज़ी में लिखा जाता है- kisne sikhayi India ko investment ki Bhasha?। तो यह है नये भारत की सोच कि जैसा आसानी से आता है बोलो और ज़्यादा चक्कर में नहीं पड़ने का ना।
तो बस फ़ैसला यही हुआ कि बात क्या कहनी है इससे मतलब है और इसे उसी भाषा में कहनी है जिसे लोग भी आसानी से समझ सकें। बस पाठक अब आप जान ही गये हैं कि मैं किसी एक भाषा का बन कर नहीं रह सकता। अपने देश की बोली ही मेरी भाषा होगी।
हमारे यहाँ यह मानते है कि हर सौ कोस पर खाना और भाषा बदलती है और इसलिए मैं भी थाली के बैंगन सा लुढ़कता रहूँगा और कोस कोस पर अपनी भाषा का परिमार्जन करता रहूँगा।
हिन्दी में बिन्दी की जय हो। |