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साठ से उपर का तो ज़रुर हो गया हूँ पर सठियाने जैसी कोई बात अभी तक सामने नहीं आयी है। वैसे जब कोई सठिया जाता है सारी दुनिया तो जान जाती है पर ख़ुद उसी को ख़बर नहीं होती। जानकार डाक्टरों का कहना है कि जब तक आपके मन में यह सवाल उठता है कि कहीं आप सठिया तो नहीं गये हैं तो ऐसी कोई बात नहीं होती है। जब ऐसी नौबत आयेगी तो हाल कुछ ऐसा होगा कि –हम वहाँ हैं जहाँ से हमको भी ख़ुद हमारी ख़बर नहीं आती।
पहले ज़माने में लोगों की इतनी उम्र नहीं होती थी। ६० की उम्र आसानी से नहीं मिलती थी। वैसे आदर्श तो यही था कि १०० साल की उम्र मिले। दुआऐं तो ऐसी ही ली और दी जाती थी। मामूली बीमारियाँ का भी इलाज आसानी से नहीं होता था और लोग मामूली बीमारी में ही ऊपर वाले को प्यारे हो जाते थे। ज़माना बदल गया है। ६० का हो जाना कोई ख़ास बात नहीं है। यहाँ कनाडा में तो रिटायर होने के लिये भी कम से कम ६५ का होना पड़ता है। ८०,९० और १०० की उम्र कुछ ख़ास नहीं होती। किसी ज़माने में १०० का होना बहुत बड़ी बात होती थी। कनाडा में प्राइम मिनिस्टर की बधाई का ख़त आता था। इंगलैंड की महारानी का बधाई का ख़त आता था। गली मोहल्ले में धूम मचती थी। अब इतने लोग १०० के हो जाते है कि महारानी उन सब को ख़त नहीं लिख सकती। अब यह ख़त १०५ के बाद आते हैं।
लम्बी उम्र हो जाये और दिमाग़ से पैदल हो जायें तो फिर जीने का क्या मज़ा है। यहाँ सठिया जाने के कई नाम हैं। एलज़हाईमर, डिमेन्शिया और भूल जाने की आदत की बातें होती हैं। वैसे भूलने की बात तो सभी उम्र में और सभी के साथ होती है। यह प्रक्रिया तो बचपन से ही शुरु हो जाती है। दिमाग़ के जो सैल मरते है वह फिर कभी नये नहीं होते। किसी ने कहा है कि हम जितना सीखते हैं उतना ही भूलते हैं। यानी कि जितना ज़्यादा हम कोशिश कर कर के सीखते हैं उतना ही ज़्यादा भूलते हैं यानी बेवकूफ़ होते जाते हैं। हमारी याददाशत भी तरह तरह की होती है। हरेक की याददाशत हर विभाग में नहीं होती है। किसी को नम्बर नहीं याद नहीं रहते तो किसी को लोगों का नाम याद नहीं रहता। किसी को सूरतें याद नहीं रहती। अब मुझे ही देखें, मुझे टेलीफ़ोन नम्बर याद नहीं रहते। यह आज की बात नहीं है ३० साल पहले भी यही बात थी।
हम सभी यह चाहते हैं कि हमारी याददाशत मजबूत रहे और इसके लिए तरह तरह के लटके झटके अपनाते रहते हैं। दवाऔं, वाइटेमिनस, नैचुरल सपलिमेन्टस से दुकानें भरी पड़ी हैं। तरह के तरह के सिस्टम बरसों से बाज़ार में हैं। मैं कालेज में था तो एक दोस्त का बड़ा नाम था कि वह एक बार सुन कर ही १०० तक चीजों के नाम याद कर लेते थे और फिर उन्हें उल्टे सीधे किसी भी क्रम से दुहरा सकते थे। उन्होंने मुझे भी यह ट्रिक सिखाने की बड़ी कोशिश की पर कोई ख़ास नतीजा नहीं निकला। चार टेलीफ़ोन नम्बर भी मुझे याद नहीं रहते। भला हो सैल फ़ोन का जिसे सब याद रहते हैं पर मैं उसी को कहीं रख कर भूल जाता हूँ।
मैं जब चन्दौसी कालेज में पढ़ता था तो हर रोज़ सुबह होस्टल में एक बूढ़ा चाय वाला हमें जगाने और चाय पिलाने आता था। यह पंजाब से आया रिफ़्यूजी अकेला था। इसका सब परिवार हिन्दुस्तान पाकिस्तान के बँटवारे की भेंट चढ़ चुका था और यह हम सब हो्स्टल वालों को अपने बच्चों की तरह मानता था। सफ़ेद बालों और सफ़ेद मूँछों वाला लम्बा बूढ़ा जब सफ़ेद चमकती हुई सलवार कमीज़ में आ कर सुबह ५ बजे हमें जगाता था तो हम सब लोगों को लगता था कि जैसे हमारे घर का कोई बुज़ुर्ग आ कर हमें उठा रहा है। हम सब उसका आदर करते थे और यह हिम्मत नहीं होती थी कि पलटी मार कर फिर सो जायें और उसे टाल जायें। वैसे ट्राई करने पर भी दरवाज़े से हटने वाला बन्दा नहीं था। चाय के साथ नसीहतों का भी सिलसिला चल निकलता था और उसका सार यह होता था कि ना जाने किस तरह पेट काट कर हमारे माँ बाप ने हमें यहाँ पढ़ने भेजा है और हमारा यह फ़र्ज़ बनता है कि हम मेहनत करके उनके पैसे को सुखारत करें। बात यहाँ तक तो ठीक थी पर याददाशत बढ़ाने के तरीकों का भी वह माहिर था। उनमें पहली बात तो यह थी सुबह सुबह ही कुछ दन्ड बैठक करी जाय। यह बात भी गले उतरती थी। दूसरी बात यह थी कि अलीगढ़ी बिस्कुट के ऊपर मक्खन लगा कर और उस पर बरफ़ी लगा कर खाने से हमें अपना सबक याद करने में बड़ी आसानी होगी। हेली होस्टल में रहने वाले और हेली लोडर्स कहलाने वाले मोडर्न जैन्टलमैन्स के लिए यह बात कितनी मुशकिल थी यह आप सब पाठक बाख़ूबी समझ सकते हैं। पर हमारे उस बूढे बाबा के सामने आपकी भी कुछ नहीं चलने वाली थी। मैने अपने चन्दौसी प्रवास में तीन चार सेर बरफ़ी तो गले से नीचे उतार ली होगी पर नतीजा यह है कि मुझे उस मेहरबान बुज़र्ग का नाम तक नहीं याद है। हो सकता है कि आप महानुभावों ने अलीगढ़ी बिस्कुट न देखा हो। आपकी सुचना के लिए बताये देता हूँ कि यह कररा बिस्कुट किसी दाँत के डाक्टर की सलाह पर लोगों के दाँत तोड़ने के लिए ईजाद किया गया था और बिना चाय में डुबोये नहीं खाया जा सकता था। अब यह कल्पना कीजिये कि इस बिस़कुट पर मक्खन लगा है और उस पर बरफ़ी फैलाई गई है और उसे चाय में डुबो कर खाना है या सुबह सुबह ही अपना दाँत तुड़वाना है। पाठक आप तो ख़ुद ही समझदार हैं अब आपसे और क्या कहूँ। मुझे पता नहीं कि अब यह अलीगढी बिस्कुट लोगों के दाँत तोड़ने के काम आता है या नहीं पर मैंने जो इससे १९५८ में पींछा छुड़ाया तो फिर पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा।
बचपन में हमारी नानी जी और हमारी माँई जी का भी यह विशवास था कि सुबह दही पेड़ा खा कर जाने से याददाशत अच्छी रहती है और पढ़ाई ठीक होती है। दुनिया में हर देश की माँऔं के अलग अलग लटके झटके हैं। कहीं अन्डे की ज़र्दी है तो कहीं मछली है तो कहीं बादाम पत्थर पर घिसने की बात हैं। जब मैं बरेली कालेज में था तो हमारे अँग्रेज़ी के प्रोफ़सर श्री आर पी जौहरी साहब मुझ पर बहुत मेहरबान थे। यह हमारे मामा जी के बड़े पुराने दोस्त थे और मुझे इस बहाने बचपन से जानते थे। यह बड़े अच्छे फ़िलास्फर भी थे और मुझे उनके पास बैठ कर बहुत कुछ सीखने को मिला। यह हमेशा अपने दोनों हाथ मलते रहते जैसे साबुन से धो रहे हों। वेदों के ज्ञानी थे और संस्कृत के विद्वान थे। उनका यह मानना था कि ताज़े मक्खन में सफ़ेद मिर्च का पाउडर मिला कर खाने से बुद्धी बहुत तीव्र हो जाती है। यह हमें परीक्षा के दिनों कम से कम दो महिने तक करना होता था। अब अगर आपसे यह कहा जाये ज़रा रोज़ दो महिने तक ताज़े मक्खन का प्रबन्ध कीजिये तो पाठक आपको नानी दादी याद आ जायेगी। पर मैंने और मेरे दोस़्त रमेश रस्तोगी ने तो यह किया ही और यह उसकी बरकत कहिये या जौहरी साहब का आशीर्वाद कहिये कि अभी तक अपना और उनका नाम तो याद है ही। रमेश अब बहुत मशहूर ज्योतिषी हो गया है और उसे लोगों का आगा पीछा सब याद रहता है पर उसकी घर वाली पाँच मिनट पहले क्या कह कर गई है यह याद नहीं रहता है।
सठिया जाने या भुल्लकड़ होने की स्थिति किसी एक उम्र में नहीं बन जाती वरन् सदा ही हमारे अन्दर सोई पड़ी रहती है और जीवाणुऔं की तरह सही वातावरण मिलते ही जाग कर अपना खेल दिखाने लगती है। ईलेन के चाचा १०३ साल की उम्र में भी बड़े ही चुस्त दुरुस्त थे, शरीर से भी और दिमाग़ से भी। उनके अनुसार अगर अपना दिमाग़ तेज़ और तन्दुरस्त रखना है तो मक्खन, पेढ़े, बादाम, बर्फी और सफ़ेद मिर्च को छोड. कर नीचे लिखी बातो पर ध्यान दें।
१. सदा कुछ न कुछ काम करते रहें. २. स्वास्थ ठीक बनाये रखें. ३. किसी चीज़ के विशेषज्ञ बन जायें. ४. कुछ नई चीज़ सीखते रहें। ५. समयानुसार बदलते रहें, रुढ़ीवादी न बनें। ६. दिमाग़ी कसरत जैसे वर्ग पहेली आदि करते रहें। ७. जिगसा पज़लस करते रहें। ८. ब्रिज खेलें। ९. हर तीसरे साल एक नयी भाषा सीखें। १०. टीवी देखना बन्द करें। ११. नये नये खिलौनौं से खेलें। १२. नये दोस्त बनायें और उनके साथ सैर सपाटे करें। १३. नये नये तरजुबे करते रहें जिससे नये नये अहसास होते रहें।
यह बातें मैंने अंकल सिंगर के बहाने से लिख दीं पर उनकी हैं नहीं। यह एक बहुत मशहूर अल्ज़हाइर विषेशज्ञ की सलाह है। काम की बात है पर याद रहे जब ना। बहुत मुशकिल है किसी काम का आसाँ होना।
अब पाठक याद तो एक दिन कमज़ोर होनी ही है तो कौन इतना ख़टराग करे। पेढ़े बरफ़ी वाली बात ज्यादा गले उतरने वाली है और इसे याद रखना भी आसान है. |