o यह भी क्या कोई लिखने की बात है।
o आत्म निवेदन
o प्रतीक्षा
o सूरज है सिन्दूरी
o पिया और पपीहा
o उलझन
o उदासीनता
o हरीश गुरु
o आदि गुरु
o मेरा संगीत का सफ़र
o किताबें ही किताबें
o छपने छपाने की बात
o मैं बोलता क्या हूँ?
o सठिया जाने का मामला
o जादूगर गुरु
o मदारी दरवाज़े की बात
o कुछ कहने न कहने की बातें ।
o समझता तो हूँ पर कहता नहीं हूँ
o मै खाता क्या हूँ
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लेख कविताऐं



छपने छपाने की बात

मेरी नज़र में तुलसी की रामायण और वेद व्यास की गीता जितनी पढ़ी गई और छपी उतनी शायद ही कोई किताब हो। अँग्रेज़ी के शेक्सपियर को जितना पढ़ा और छापा गया है वह भी एक मिसाल है। तुलसी, वेद व्यास, शेक्सपियर का अपना कोई पब्लिशर था या उनको कोई रायल्टी मिली या नहीं इसका कुछ पता नहीं चलता। तुलसी और वेद व्यास तो संत थे और जंगल घाट पर बैठ कर महाकाव्य रचा करते थे और लोगों को सुनाया करते थे। शेक्सपियर नाटक घर चलाते थे और उनके रईस हो जाने की कोई ख़बर नहीं है। अब आज उनके पब्लिशर इन किताबों से करोड़ों कमाते हैं पर इन लेखकों को तो कोई रायल्टी नहीं दी जाती। आजकल ख़बर आती रहती है कि कुछ लेखकों को किताब लिखने से पहले ही करोड़ों की अग्रिम राशि मिल जाती है। तुलसी और वेद व्यास तो ख़ैर स्वान्ताह सुखाय और ईश सेवा में लिखते थे और दाल रोटी कमाना उनका ध्येय नहीं था। बहुत से लेखक शौक के लिए लिखते हैं और घर चलाने के लिए नहीं लिखते। फिर भी अपना लिखा छपा हुआ देखना चाहते हैं। पूर्णकालिक लेखक की मजबूरी है कि अपनी लिखाई की ही कमाई खायें। पब्लिशर का मिलना कोई आसान काम नहीं है। और अगर मिल भी जाए और किताब छप भी जाए तो रायल्टी का इन्तज़ार तो बड़ा लम्बा होता है।
लेखकों की हमेशा शिकायत रही है कि रायल्टी मिलना तो दूर बिक्री का हिसाब भी नहीं मिलता है। पब्लिशर हमेशा अपना रोना रोता है। काग़ज़ की कमी, ग्राहकों की कमी और न बिकी किताबों का मामला भी अपनी जगह होता है।

हिन्दी की किताबों की छपाई और बिक्री की बात तो बिल्कुल ही अलग है। कई पब्लिशरों से मेरे निजी सम्बन्ध हैं और सभी का यह रोना है कि हिन्दी पाठकों को किताबें ख़रीदने की आदत नहीं है। मेरा अपना तजुरबा भी कुछ यही कहता है। मुझे बचपन से ही किताबे पढ़ने की और उससे भी ज़्यादा ख़रीदने की आदत है। किताबें छूना और जमा करना हमेशा से मेरा जनून रहा है। मेरे ज़्यादातर दोस्त पढ़ने लिखने वाले लोग है लेकिन जो किताबें माँग कर ले गये कभी वापस नहीं लाए। आप ने भी देखा होगा कि हिन्दुस्तानियों
के घरों पर किताबें कम ही देखने को मिलती हैं। बहुत से पढ़े लिखे लोग कोर्स कि किताबों तक ही सीमित रह जाते हैं। स्कूल कालेज की पढ़ाई ख़्तम करने के बाद यह किताबों का मुँह भी नहीं देखना नहीं पसन्द करते। जान बची तो लाखों पाये। प्रकाशकों की बात ठीक ही लगती है कि जब बिकती ही नहीं हैं तो फिर छापी क्यों जायें।

सब जानते हैं कि निराला जैसे रत्न रायल्टी के पैसे के लिए तरसते रहे और भिखारी की तरह रहने पर मजबूर हुए। प्रेमचन्द जैसे विख्यात लेखक अपना प्रेस खोलने और अपनी किताबें ख़ुद छापने पर मजबूर हुऐ। यशपाल ने भी कुछ ऐसा ही काम किया। बहुत से लेखकों ने कमोबेश ऐसे ही तरीके अपनाये है अपनी किताबों को छपने छपाने के। कुछ लेखक अपनी किताबें स्कूली कोर्सों में लगवाने में सफ़ल हो जाते हैं और विद्यार्थी वह किताबें ख़रीदने और पढ़ने लिए मजबूर हो जाते हैं। आप सोचेंगे कि ऐसे लेखकों की तो चाँदी हो जाती होगी। पर वास्तव में ऐसा होता नहीं है क्योंकि पब्लिशर अक्सर इनको हिसाब देता ही नहीं है। संस्करण पर संस्करण निकलते रहते हैं पर लेखक बेचारे को पता ही नहीं चलता। जो लेखक व्यापारिक मनोवृत्ति के हैं वह लिखते हैं, अपनी किताबें ख़ुद छापते हैं और ख़ुद ही बेचते हैं। यानि यह चारों कोने दाब कर रखते हैं। इस तरह का पैसा और अक़्ल हर लेखक को नसीब नहीं हो पाती है।

पाठक, अपनी लिखी हुई चीज़ को छपी हुई देखने का नशा बहुत बड़ा होता है और हर छोटा बड़ा लेखक इसका शिकार हो ही जाता है। नये लेखकों को प्रकाशकों की चौखटों पर बड़े सर फोड़ने के बाद भी सफ़लता नहीं मिलती। आख़िर में झक मार कर यह लोग सोच लेते हैं चलो हम अपनी पहली और दूसरी किताब ख़ुद अपने पैसे से ही छपवा लेंगे। यह ऐसा कर भी लेते हैं और अपने घरों में ही किताबों के ढेर लगा लेते हैं। किताबों का बिकना कोई ख़ाला का घर नहीं है। कुछ किताबें तो दोस्तों रिशतेदारों को मुफ्त दे दी जाती हैं और बाकी किसी कोने में धूल चाटती रहती हैं। अब अपना पैसा लगा कर किताबें छपवा भी लें और फिर कोई पढ़ने और तारीफ़ करने वाला न मिले तो फिर तो यह गुनाह बे लज़्ज़त जैसी ही बात हुई। फूल जंगल में खिला तो फिर देखा किसने।

आधुनिक तकनीक और कम्पयूटरों ने इस दुविधा का बड़ा आसान हल निकाल दिया है। अब अपना लिखा छापे में देखने के लिए किसी प्रकाशक या टाईपसेटर या प्रेस की ज़रुरत नहीं है। शौक से लिखिए, कम्पयूटर पर खुद ही टाइप कीजिये, अपनी वेबसाइट पर छापिये और पब्लिश कीजिये। इसका ख़र्चा न के ही बराबर है। काग़ज़ के लिए पेड़ों का सर भी नहीं काटना पड़ता। यह बड़ा ही हरा भरा काम है। इस काम का कार्बन फ़ुट प्रिंट भी कुछ नहीं है। एल गोर का प्रशंसा पत्र आपको सहज ही मिल जायेगा। दुनिया भर के पाठक आपका लिखा हुआ बिना कौड़ी छदाम ख़र्च किये पढ़ कर आपकी वाह वाही करेंगे।
यह हई न बात, हर्र लगे न फिटकरी और रंगत चोखी चोखी।

भावी लेखकों से निवेदन है कि मैने आपको बडी बचत वाली तरकीब बताई है तो मुझे बतौर रायल्टी कुछ न कुछ तो भेज ही दें।



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