o यह भी क्या कोई लिखने की बात है।
o आत्म निवेदन
o प्रतीक्षा
o सूरज है सिन्दूरी
o पिया और पपीहा
o उलझन
o उदासीनता
o हरीश गुरु
o आदि गुरु
o मेरा संगीत का सफ़र
o किताबें ही किताबें
o छपने छपाने की बात
o मैं बोलता क्या हूँ?
o सठिया जाने का मामला
o जादूगर गुरु
o मदारी दरवाज़े की बात
o कुछ कहने न कहने की बातें ।
o समझता तो हूँ पर कहता नहीं हूँ
o मै खाता क्या हूँ
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लेख कविताऐं



किताबें ही किताबें

किताबों का शौक मुझे बचपन से लग गया। लोगों को तरह तरह की लतें होती है। मैं पान, सिगरट, शराब जैसी लतों से तो साफ़ बच कर निकल गया पर काग़ज़ की बीमारी ने मुझे बुरी तरह जकड़ लिया। अगर मेरे सामने कोई काग़ज़ का टुकड़ा आ जाये तो मेरे हाथ उसके की तरफ अनजाने में ही बढ जाते हैं। पुरानी किताबों की ख़ुशबू मुझे मस्त करके सातवें आसमान में उड़ा ले जाने के लिये काफ़ी है। यह नशा भाँग, अफ़ीम, कोकीन और पुरानी शराब से भी बढ़ कर है। लाइब्रेरी मेरे लिये किसी भी मन्दिर से बढ़ कर है। वाशिंगटन की लाइब्रेरी आफ़ काँग्रेस दुनिया की सबसे बड़ी है। हर छपी हुई किताब यहाँ ज़रुर होती है। आप कोई भी किताब उठा कर देखें तो उसमें उसका लाइब्रेरी आफ़ काँग्रेस का कैटोलाग का नम्बर ज़रुर होता है। मुझे यहाँ भी जाने का सौभाग्य मिला है। जब मैं यहाँ अभिभूत सा खड़ा था तो जानते हैं मेरे मन में क्या बात आई। मैंने सोचा कि अगर ईशवर इस समय मेरे सामने आ जाये और मुझे एक वरदान माँगने को कहे तो मैं यही कहूँगा कि हे प्रभू मुझे यहाँ का लाईब्रेरी कार्ड दिलवा दीजिये। इसके लिये अमरीकी काँग़्रेसमैन होने की शर्त है और इसके लिये ऊपर वाले की मदद की दरकार है। मैं इटली के फ़्लोरेंस की इस लाइब्रेरी में भी गया हूँ जहाँ लियानार्दो द विंची और माइकिलेजंलो की लिखी पंडुलिपियाँ हैं, दान्ते की लिखी किताबें हैं। शायद ही रेनेसान्स के युग का कोई भी विद्वान होगा जिसकी किताबें यहाँ न हों। यहाँ का लाइब्रेरी कार्ड तो मेरी बहुत बहुत बड़ी थाती है। दुनिया के रईस लोगों का किताबें सजाने का शौक रहा है। योरप के सब बड़े बड़े राज महलों में बड़ी बड़ी सुन्दर लाइब्रेरीयाँ बनी हैं। माइकिलेजंलो का एक बहुत शानदार करतब फ़्लोरेंस की एक लाइब्रेरी है। इन ख़ूबसूरत अलमारियों में बहुमूल्य जिल्दों में चित्र सजित किताबें हैं। पढ़ने का इनका कितना शौक था या यह किताबें कभी खोली भी गईं या नहीं यह सवाल मेरे मन में हमेशा रहता है। हर बादशाह की शान होती थी उसके पास लाइब्रेरी हो और इन पर बहुत पैसा लगता था। जो ख़रीद सकते थे वह पढ़ते नहीं थे और जो पढ़ सकते थे वह ख़रीद नहीं सकते थे।

मेरे इस शौक की शुरुआत बरेली में हुई। मैं जिन मामा जी के घर में रहता था वह नामी वकील थे और बहुत शौकीन मिज़ाज़ थे। लिखने पढ़ने के शौकीन थे और बड़ी नफ़ासत की हद तक थे। उनकी लिखने पढ़ने की मेज. एक बड़ा ख़ज़ाना थी। वह रंग रंग के पैड और हर पैड चार साइज़ों मे रखते थे। ख़त का मज़मून काग़ज़ के बीचों बीच मे फ़िट होता था और मोती जैसे अक्षरों में लिखा जाता था। जितना बड़ा ख़त लिखना होता था उसी के हिसाब से पैड चुना जाता था। मैंने इतना अच्छा लेख बहुत ही कम देखा है। भाषा पर उनकी पकड़ भी ख़ूब थी। तरह तरह के पैन मेज़ पर रखी सन्दूकची में ताले में बन्द रहते थे। पैडों पर उनका मोनोग्राम एम्बौस होता था। अब पूछिऐ कि इतने सारे पैडों और रंगों का क्या काम था। आफ़िस के काम के ख़त क्रीम काग़ज़ पर लिखे जाते थे कि उनकी गरिमा बनी रहे। निजी ख़त हल्के नीले काग़ज़ पर होते थे और सेमी आफ़िशियल ख़त हरे रंग के काग़ज़ पर होते थे। काश् मुझे कुछ समझ समय रहते आई होती तो मैंने उनके कुछ ख़त बचा कर रखे होते। उनके जीवन का लिखा आख़िरी ख़त ही मेरे पास है।
इस समय वह कम ही देख पाते थे और अन्दाज़ से ही लिखते थे। उनके अक्षर बहुत छोटे और सुघड़ होते थे और उनकी आदत थी कि वह अन्तर्देशिय पत्र पूरा भर कर हाशिये और कोने सब भर देते थे। उन्हें इस बात का दुख रहता था कि वह अपनी ग़लतियाँ ठीक नहीं कर पाते थे और मुझे हिदायात करते थे मैं ख़ुद ही उनकी ग़लतियौँ ठीक करके पढ़ लूँ। में अन्दाज़ा ही कर सकता हूँ कि यह शब्द लिखते समय उनके दिल पर क्या गुज़रती होगी। कुछ ज़रुरत से ही गर्वीले थे मेरे प्यारे मामा। उनके जैसे सुन्दर और अनोखे ह्स्ताक्षर भी मैंने आजतक नहीं देखे हैं।

हर वकील के पास लॉ की किताबे तो होती ही हैं। उनका चैम्बर भी इन किताबों से भरा था। चमड़े के जिल्द वाली यह किताबें इलाहबाद से आतीं थीं। इन पर लाल और काले चमड़े पर सुनहरी अक्षरों में किताब का नाम और एस बी नाग वकील का नाम लिखा होता था। मुझे यह सब एक परी घर सा लगता था। इससे भी बड़ी लाइब्रेरी उनके सीनियर बाबू मनमोहन लाल साहब की थी। यह बरेली के बहुत ही मशहूर वकील थे और बरेली कालेज में ला क्लास की शुरुआत भी बाबूजी ने ही की थी। बड़े मामाजी ने अपनी ट्रेनिंग इन्हीं के जूनियर की हैसियत से की थी और नियम से करीब करीब हर दूसरे तीसरे दिन वहाँ जाते थे। मैं उनके साथ साथ हर जगह जाता था और यहाँ तो बहुत ही शौक से जाता था क्योंकि बउआ जी बहुत अच्छा खाना बनाती थीं और मुझे तो खाने को कुछ न कुछ ज़रुर ही मिलता था। वैसे मेरी ट्रेनिंग का बहुत बड़ा हिस्सा मामाजी के साथ जगह जगह जाना और हर तरह के लोगों से मिलना और उनकी बातें सुनने का है। पर खाने की बात छोड़ें तो उसके बाद सबसे ज़्यादा असर मुझ पर बाबूजी की किताबों का हुआ।



मेरे सपने के कमरे की चारों दीवारें किताबों की अलमारियाँ है और बीच में मेरी खाट पड़ी हुई है। कालेज के दिनों में मैंने बहुत ही सीधी साधी ज़िन्दगी की कल्पना और उम्मीद की थी। मैं किसी छोटे शहर में मास्टर बनना चाहता था। मेरे स्वप्नों का घर किताबों से भरा भरा और छोटा सा था। बैठक के बाहर एक छप्पर पड़ा था जिसके नीचे एक भैंस बँधी थी। छप्पर के ऊपर लौकी तरोई की बेलें चढ़ी हुईं थी। यह भी इरादा था कि फ़सल पर चने की और मूँग की दाल की बोरियाँ भर लेंगे और बस यों ही पढ़ते पढ़ाते हुऐ जीवन बीतेगा। उस समय मुझे कपड़ों का भी शौक नहीं था। बस खादी के कुरते पजामे ही पहनावा था। अपने अँग्रेज़ी के प्रोफ़ेसरों को चिढ़ाने के लिये कभी कभी कन्धे अँगौछ भी डालता था। पर ऐसा न होना था और न हुआ। असली जीवन इस छोटे से स्वप्न से कितनी दूर बना यह अब आपको क्या बताऊँ नहीं। यह भी किसी अलिफ़ लैला की कहानी से कम नही है?

पर किताबों का शौक वहीं का वहीं है। यहाँ माँट्रियल का घर किताबों के बोझ से चरमरा सा रहा है। अब तो यह भी चिन्ता है कि इन सब किताबों का क्या होगा। ख़ैर इस की चिन्ता जिसे करनी होगी करेगा मैं तो बस जमा करने का ही काम जानता हूँ। मेरी प्रोफ़ेसर पत्नी भी इस मामले में मुझसे से कम नहीं हैं। हम दोनों का किताबों की दुकान में घुस जाना बहुत आफ़त का मामला है। हमारे घर का अन्दाज़ा आप यहाँ आये बिना नहीं कर सकते। जैसे मुफ़्तख़ोरे को शकर मिलती रहती है वैसे ही मेरे सब दोस्त भी इसी धज के हैं। इनकी लिखी किताबें भी मुझे मुफ़्त में मिलती रहती हैं।

हमारे बड़े भाई जैसे परम मित्र शयाम बहादुर वर्मा दिल्ली में तीन बेड रुम के फ़्लैट में अकेले रहते हैं और पागलपन की हद तक किताबें पढ़ते और जमा करते हैं। इनके घर में दो चरपाईयाँ डालने की भी जगह नहीं है। यह पिछले ११ साल से हिन्दी का आधुनिक शब्दकोष बना रहे हैं और यह अभी भी बन रहा है। सूर्पनखा की आँत भी इससे बड़ी नहीं हई होगी। इस घर में दुनिया का सबसे बड़ा शब्दकोषों का ख़ज़ाना भी है। इनके बरेली के बमनपुरी वाले मकान में भी किताबों के चट्टे के चट्टे लगे थे। टाँड के टाँड किताबों की गठरियों से भरे थे। मौसीजी की पुरानी धोतियों का उपयोग इन्हीं के लिए होता था। इनके पिताजी बाबू लाल चन्द जी इन किताबों की देख भाल किया करते थे। वह भी बड़े प्यारे इन्सान थे। बहुत गुस्सैल, बहुत प्यार करने वाले कभी बहुत होशियार और कभी बहुत सनकी। मुझसे उनका बड़ा प्रेम था। तब हमें सब लोग राम शयाम दो भाई समझते थे। वह शयाम भाई साहब और उनकी किताबों को बहुत समर्पित थे। सब कुछ करने के बाद भी लाखों दीमकों के भोजन का भी ख़ूब इन्तज़ाम हुआ। बाबूजी और मौसी जी अब नहीं हैं और वह बरेली वाला घर भी नहीं है। मैं यह भी नहीं जानता कि उन हज़ारों किताबों का क्या बना।

पिताजी के मृत्यु के बाद शयाम भाई साहब ने उनकी आत्मा पैल्नचैट की मदद से बुलाई और उनसे तरह तरह की बातें हुईं। इनमें इस बात का भी पता चला कि स्वर्ग में लाइब्रेरी आफ़ काँग्रेस से भी बड़ा किताबघर है। यहाँ पर सब लिखी हुई किताबें तो हैं ही मगर वह किताबें भी हैं जो अभी लिखी ही नहीं गयीं हैं और भविष्य में कभी लिखी जायेंगी। जब यहाँ के कर्ता की आज्ञा हो जाती है तभी कोई किताब लिखी जाती है या ज्ञान बाँटा जाता है। मुझे भी यही लगता है कि मैं किताबें नहीं ढूँढ़ता वरन् किताबें ही मुझे कहीं से आ कर ढूँढ़ लेती हैं। पढ़ाई लिखाई और समझदारी महज़ संयोग नहीं है। यह दैवी इच्छा है और आकाशिक खेला है। उनसे जब पूँछा गया कि वहाँ शयाम भाई साहब की भी कोई किताब है या नहीं तो उन्होंने कहा कि हाँ बहुत सी हैं। उन्होंने सूक्ति कोष के तीन भागों का ज़िक्र किया। यह किताब तो अभी पूरी भी नहीं हुई थी और किसी को पता नहीं था कि यह तीन भागों में आयेगी। शब्दकोष भी अभी बन ही रहा है। छह सात सालों से सुनता आ रहा हूँ कि बस अब हुआ अब हुआ। समय के साथ साथ नये नये शब्द बनते जाते हैं। अभी तक तो छह या सात खंडों का अनुमान है पर आकाशिक किताबघर में इसके कितने खंड हैं यह मुझे नहीं पता। पिताजी ने यह भी बताया कि स्वर्ग में नमकीन चीज़ें नहीं मिलती पर वहाँ का दूध बहुत अच्छा है।

पाठक आप समझ रहे होंगे कि मैं अफ़ीम की पिनक में या भंग की तरंग में हूँ पर यह बता दूँ कि मेरी काली कामरिया पर चढ़े न दूजो रंग। हो न हो यह किसी पुरानी किताब की ख़ुशबू का ही नशा है।



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